गीता ज्ञान
गीता श्लोक : 3.26
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ।। गीता : 3.26।।
ज्ञानी व्यक्ति को अपनी उच्च समझ दिखाकर अज्ञानियों को कर्म करने से हतोत्साहित नहीं करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि स्वयं अनासक्त होकर कर्तव्य-पालन करते हुए, दूसरों को भी कर्म करने की प्रेरणा दे — ताकि समाज में कर्म-व्यवस्था बनी रहे और अज्ञानी धीरे-धीरे ज्ञान की ओर बढ़ सकें।
ऊपर श्लोक में “कर्मसङ्गिनाम्” का शब्दार्थ
कर्मसङ्गिनाम् > कर्म + सङ्गिन् + आम्
कर्म = कर्म (क्रिया, कार्य)
सङ्गिन् = आसक्त
आम् = “के” (बहुवचन, सम्बन्ध कारक
“कर्मसङ्गिनाम्” = कर्म आसक्ति के अधीन कर्म करनेवाले , ज्ञानियों के
अब ऊपर दिएगए श्लोक 3.26 के गूढ़ भाव को समझने के लिए गीता श्लोक : 18.49 , 18.50 को भी देखना चाहिए जो कहते हैं …
आसक्तिमुक्त कर्म से नैष्कर्म्य सिद्धि मिलती है जो ज्ञानयोग की परा निष्ठा है । कर्मयोग से ज्ञानयोग में प्रवेश पाने की एक स्पष्ट झलक यहां मिलती है।
दो प्रकार के कर्म हैं - प्रवृत्ति परक और निवृत्ति परक। प्रवृत्ति परक कर्म, कर्म बंधनों के प्रभाव में किए जाने वाले भोग कर्म होते हैं और यही कर्म जब कर्म बंधनमुक्त स्थिति में होने लगते हैं तब इन्हें निष्काम कर्म कहते हैं जिसे निवृत्ति परक कर्म भी कहते हैं।
भोग कर्म में जब भोग बंधनों की अनुपस्थिति होती है तब भोग कर्म , कर्मयोग बन जाता है।
इस प्रकार कर्म भोग से कर्मयोग की यात्रा में कर्म तो वही होते हैं केवल कर्म बंधन या भोग बंधन तत्त्वों की अनुपस्थिति हो जाती है।
~~ ॐ ~~
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