Monday, February 13, 2012

प्रभु के वचन

गीता में प्रभु के सूत्र

गीता सूत्र – 2.14

इंद्रिय सुख – दुःख क्षणिक होते हैं

गीता सूत्र – 5.22

इंद्रिय सुख – दुःख रात – दिन की भांति आते जाते रहते हैं,ज्ञानी इस बात को समझते हैं

गीता सूत्र – 18.38

इंद्रिय सुख भोग – सुख होता है जो भोग के समय अमृत सा भाषता है पर इसका परिणाम बिष सा होता है



गीता के तीन सूत्र आप को एवं हमको उस आयाम में पहुंचा रहे हैं जिस आयाम में प्रभु बसते हैं / गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं ------

इंद्रिय - बिषय के संयोग से मन को जो मिलता है वह भोग है और भोग के सुख में दुःख का बीज पल रहा होता है / कर्म – योगी वह योगी होता है जो इंद्रियों को समझता है , बिषयों को पहचानता है और मन के विज्ञान को गहराई से देखता है /


====== ओम् ======


Friday, February 10, 2012

गीता प्रसाद

सबमें स्व को निहारना अपनें में सब को देखना ज्ञानी के लक्षण हैं

ज्ञान सत्य का द्वार है

माया को ज्ञान से जाना जाता है

ज्ञान से अज्ञान का बोध होता है

ज्ञान से मोह की पकड़ टूटती है

कर्म योग की सिद्धि पर ज्ञान मिलता है

ज्ञानी कामना रहित होता है

संकल्प रहित ज्ञानी होता है

संदेह जिसको न पकड़ सके वह है ज्ञानी

अहंकार की छाया तक जिस पर न पड़ती हो वह है ज्ञानी

====ओम्======



Tuesday, February 7, 2012

गीता के तत्त्व

पुरुष , परमात्मा एवं ब्रह्म शब्दों को हम यहाँ गीता के आधार पर गीता - तत्त्व के अंतर्गत समझ रहे हैं , आइये देखते हैं गीता के कुछ और सूत्रों को /

श्लोक –6.30

सर्वत्र सबको प्रभु से प्रभु में देखनें वाले के लिए प्रभु अदृश्य नहीं रहता /

श्लोक –13.28

जो सब में आत्मा रूप में परमात्मा को देखता है वह यथार्थ देखता है /

श्लोक-10.20

सब में आत्मा रूप में मैं रहता हूँ /

श्लोक –13.29

सब में प्रभु को एक सामान देखनें वाला परम धाम का यात्री होता है /

श्लोक –14.26

अभ्याभिचारिणी भक्ति में डूबा भक्त गुनातीत होता है और ब्रह्म स्तर का होता है /

श्लोक –13.31

ब्रह्म – योगी ब्रह्माण्ड को ब्रह्म के फैलाव के रूप में देखता है /

गीता में प्रभु श्री कृष्ण बारह अध्यायों में लगभग 80 श्लोकों के माध्यम से उसे ब्यक्त करना चाह रहे हैं जो प्रभु श्री कृष्ण के शब्दों में --------

अचिंत्य,अब्यक्त,असोचनीय,अकल्पनीय,निर्गुण एवं निराकार है

और

जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एवं ब्रह्माण्ड में स्थित सभीं सूचनाओं का आदि मध्य एवं अंत है /

====ओम्=====


Monday, February 6, 2012

गीता के मूल तत्त्व भाग तीन

यहाँ हम गीता के तत्त्वों को देख रहे हैं और इस श्रृंखला के अंतर्गत पुरुष , परमात्मा एवं ब्रह्म शब्दों के संदर्भ में गीता के कुछ सूत्रों को दिया जा रहा है , आइये अब कुछ और सूत्रों को देखते हैं /

श्लोक – 14.3 – 14.4

ब्रह्म जीव धारण करता है , जीवों का जनक बीज मैं हूँ और ब्रह्म मेरे अधीन है /

श्लोक – 13.12 – 13.13

ब्रह्म न सत् है न असत्

श्लोक – 13.16

ब्रह्म सबसे दूर है , सबके समीप है और सबमें है

श्लोक – 7.10 , 9.10

सभीं जीवों का आदि बीज मैं हूँ

श्लोक – 8.3

अक्षरम् ब्रह्म परमं

श्लोक – 9.6 – 9.7

सभीं प्राणी मुझमें स्थित हैं और कल्प के अंत में सभीं प्राणी मुझमें समा जाते हैं

श्लोक – 9.8

जगत मेरे अधीन है

श्लोक – 9.9

मैं कर्म मुक्त हूँ और सबका द्रष्टा हूँ

यहाँ आप का सीधा सम्बन्ध गीता से हो रहा है और मैं आप दोनों का द्रष्टा बना रहना चाहता हूँ / जब आप का बिलय गीता में हो जाएगा तब मैं भी आप के ही साथ रहूँगा अतः गीता के शब्दों को मैं अपनें शब्दों में ढालना नहीं चाहता / गीता और आप के मध्य मैं मात्र एक संपर्क सूत्र आना रहना चाहता हूँ , गीता का भावार्थ करना मेरे बश में नहीं , आप स्वयं अपना भावार्थ करें और खुश रहें /


==== ओम् ============




Sunday, February 5, 2012

गीता के मणि

  • संन्यास प्रभु का द्वार है

  • संन्यास स्व के प्रयास का फल नहीं प्रभु का प्रसाद है

  • भोग से भागा हुआ संन्यासी नहीं

  • भोग में उठा होश ही संन्यास में पहुंचाता है

  • भोग में डूबा,भोग में आसक्त संन्यासी नहीं

  • तन – मन का भोगी संन्यासी नहीं

  • वह जो भोग का द्रष्टा होता है , संन्यासी होता है

  • संन्यास में एक तरफ भोग - संसार और अगली तरफ प्रभु का आयाम दिखता है

  • भोग से भोग में हमारा अस्तित्व है

  • भोग से योग में पहुँचना हमारा लक्ष्य है

    ====ओम्======


Saturday, February 4, 2012

गीता पारस सूत्र तीन

मन से भोग और मन से भगवान की यात्रा होती है

सब में स्व को देखना और स्व में सबको देखना ही ज्ञान है

ज्ञान से स्व का बोध होता है

ज्ञान से माया रहस्य खुलता है

ज्ञान से सत् का बोध होता है

ज्ञान बुद्धि में द्वैत्य – द्वंद्व नहीं बसते

आसक्ति रहित कर्म ज्ञान – योग की परा निष्ठां है

ज्ञान की मूल बुद्धि में नहीं ह्रदय में होती है

ज्ञान की पाठशाला ध्यान है

ध्यान में परिधि से केंद्र की यात्रा होती है

परिधि है संसार और केन्द्र है ब्रह्म


===== ओम्=====



Thursday, February 2, 2012

गीता पारस सूत्र

संन्यास प्रभु का द्वार है

कर्म – योग संन्यास का एक उत्तम माध्यम है

कर्म में कर्म – बंधनों का अप्रभावित होना ही कर्म संन्यास है

कर्म होनें में जब भाव प्रधान न हों तब वह कर्म सन्यासी का होता है

आसक्ति रहित कर्म ही कर्म – संन्यास होता है

आसक्ति रहित कर्म से नैष्कर्म्य की सिद्धि मिलती है

नैष्कर्म्य की सिद्धि ज्ञान योग में पहुंचाती है

आसक्ति रहित कर्म शांत मन से होता है

शांत मन निश्चयात्मिका बुद्धि के साथ होता है

मन को मित्र बनाता हैध्यान


=====ओम्=====



Followers