Saturday, February 25, 2012

गीता ज्ञान भाग एक

जो है वह प्रभु का प्रसाद है , यह सोच ही ज्ञान की ऊर्जा है

The being is the gift of God , this perception is wisdom

ज्ञानी देनें - लेनें का कम नहीं करता एकिन उसके साथ होनें से रूपांतरण होता है

Man of wisdom does not give anything nor takes anything but his being purifies

गुण – तत्त्वों की परख ही ज्ञान है

Awareness of modes – elements is wisdom

मैं और तूं की सोच का मध्य जहां न मैं न तूं की सोच होती है वहाँ प्रभु बसते हैं

God dwells in a mind – intelligence net work where there is no choice

कर्म – योग में कदम बिना रखे कर्म – संन्यास कैसे संभव है

Without performing Karma how one can enter into its renunciation

कर्म संन्यास शब्द भ्रम में पहुंचाता है

Action renunciation is a misleading word

संन्यास का अर्थ संसार से या भोग से भागना नहीं उसके प्रति होश बनाना है

Renunciation does not mean escaping from the passion but its awareness takes into renunciation

संन्यासी का मन निर्मल होता है

A sanyasin has a purified mind

कर्म के बिना कोई जीव धारी एक पल भी नहीं रह सकता

No one can be without action even foe a moment

कोई कर्म ऐसा नहीं जो दोष रहित हो

All actions are having aversion



=====ओम्=====


Friday, February 24, 2012

गीता दर्शन

गुण विभाग एवं कर्म विभाग का बोध ही कर्म – योग है

Karma yoga is the awareness that action is the function of three natural modes

गुण विभाग एवं कर्म विभाग का बोध वैराज्ञ में पहुंचाता है

The awareness that three modes are the source of action takes one to renunciation

वैराज्ञ संसार का द्रष्टा बनाता है

Dispassion makes one witnesser of the universe

बिना किसी कारण जो कर्म हो वह योग कर्म होता है

Yoga action is that action which is performed without reasons

जिस मन – बुद्धि में तीन गुणों की ऊर्जा न बह रही हो वह मन – बुद्धि योगी के होते हैं

yogin,s intelligence does not have modes energy

भोग एवं भगवान के मध्य समभाव की स्थिति होती है

Evenness in passion takes you to Supreme

भोग में उठा होश योगी बनाता है

Awareness in passion is yoga

योगी तीर्थ होता है जिसके पीठ के पीछे भोग और आगे परमानंद होते हैं

Yogin is a pilgrimage where passion is at his back and absolute truth is in his hearth

जो है वह प्रभु का प्रसाद है ऎसी भावना योगी में होती है

Y ogin understand that whatever is available is a gift from the Supreme

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड प्रभु को ब्यक्त करता है

The entire universe represent the Supreme One

===== ओम्=======




Wednesday, February 22, 2012

आमा चिंतन का बिषय नहीं

गीता श्लोक –2.29

प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं ------

हे अर्जुन!कोई आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता है,कोई आश्चर्य पूर्वक इसको तत्त्व से वर्णन करता है कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई सुन कर भी इसे नहीं समझता//

Some one looks it as morvel , some one explains it as morvel , some one hears it as morvel and some one does not understand it even after listening .

गीता श्लोक –2.30

देहि नित्यं अबध:अयं देहे सर्वस्य भारत

तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि

देह में सदैव देही [ आत्मा ] अबध्य है अतः मृत्यु में रख रहे कदम वाले प्राणियों के लिए तुमको शोक नहीं करना चाहिए /

The dweller in body can never be slain and so you should not grieve for those who are stepping into death .


आत्मा के सम्बन्ध में प्रभु श्री कृष्ण के दो सूत्रों को हमनें देखा जो कह रहे हैं--------

आत्मा आश्चर्यमय है उनके लिए जो इसका वर्णन करते हैं , जो इसके वर्णन को सुनते हैं और कुछ लोग तो सुन कर भी इसे नहीं समझ पाते / कुछ लोग नहीं समझ पाते , ऎसी बात नहीं हैं अपितु आत्मा को समझनें वाले दुर्लभ योगी होते हैं जो कई सदियों के गुजरनें के बाद प्रकट होते हैं / गीता ह्लोक – 2.25 में प्रभु कहते हैं - आत्मा अचिंत्य एवं अब्यक्त है और यहाँ कह रहे हैं की कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई सुन कर भी इसे नहीं समझता / वह जो अब्यक्त एवं अचिंत्य हो उसे कोई कैसे ब्यक्त कर एकता है और कोई उसे कैसे समझ सकता है ?

आत्मा ब्यक्त होनें वाली सूचना नहीं , आत्मा चिंतन का बिषय नहीं , आत्मा तो एक आयाम है जो साधना के आखिरी सोपान से गुजरानें के बाद मिलता है और जहां साधक प्रभु की अनुभूति को समाधि के माध्यम से पाता है /


====== ओम् =======


Sunday, February 19, 2012

भोग योग समीकरण

  • कर्म में कर्म बंधनों की पहचान भोग कर्म को योग में बदलती है

  • भोग – योग एक साथ क बुद्धि में नहीं समाते

  • योग में बुद्धि निर्विकार होती है जो प्रभु की झलक पाती है

  • निर्विकार मन – बुद्धि में ब्रह्म स्थित होता है

  • निर्विकार ह्रदय परा भक्ति में पहुंचाता है

  • परा भक्ति प्रभु का द्वार है

  • अपरा भक्ति साधन है जो परा का द्वार खोल सकती है

  • परा की अनुभूति अब्यक्तातीत होती है

  • परा भक्त एक कटी पतंग सा होता है जो प्रभु पर टंगा रहता है

  • परा भक्त गुणातीत होता है


=====ओम्========


Friday, February 17, 2012

गीता राह

वैराज्ञ प्रभु का निवास है और भोग स्वर्ग नर्क दोनों का द्वार हो सकता है

प्रकृति - पुरुष से सभीं जड – चेतन हैं

प्रकृति पुरुष का फैलाव है

अपरा,परा प्रकृतियों एवं आत्मा-परमात्मा से ब्रह्माण्ड की सभी सूचनाएं हैं

आत्मा-परमात्मा का केन्द्र ह्रदय है

परम प्यार ह्रदय की धडकन में होता है

देह के नौ द्वार ज्ञान से प्रकाशित होते हैं

ज्ञान वैराज्ञ का फल है

क्षेत्र – क्षेत्रज्ञ का बोध ही ज्ञान है

ज्ञान की ऊर्जा ह्रदय में होती है न की बुद्धि में

====== ओम्======


Wednesday, February 15, 2012

गीता सूत्र

योगी कामना संकल्प रहित होता है

Yogin is free from desire and determination

योगी की नजरें प्रभु पर टिकी रहती हैं

Yogin,s full energy is centered on the Supreme One

योगी , संन्यासी , वैरागी एवं ज्ञानी एक ब्यक्ति के संबोधन हैं

Yogin , Sanyasin , Vairaagi and Gyai all are names of one who is in search of the Supreme One

ज्ञान साधान का फल है

Wisdom is the fruit of meditation

मोह वैराज्ञ में पहुंचनें नहीं देता

Delusion does not allow to enter into dispassion

संसार का द्रष्टा वैरागी होता है

Man of dispassion is the witness of the materialistic world

राजस गुण प्रभु की ओर कदम रखनें नहीं देता

passion mode does not allow to think about the Supreme

तामस गुण सात्त्विक एवं राजस के मध्य एक दिवार जैसा है

Dullness mode is like a strong rock between Goodness mode and the passion mode

काम का सम्मोहन पाप का कारण है

Sex is the root of all evils

संदेह अज्ञान का सूचक है

Doubt is the symptom of ignorance

====ओम्======


Tuesday, February 14, 2012

गीता के अनमोल रतन

मनुष्य का स्वभाव तीन गुणों के सहयोग से बनता है

स्वाभाव से कर्म होता है

कर्म के आधार पर सुख – दुःख का अनुभव होता है

प्रभु किसी के कर्म की रचना नहीं करते

प्रभु किसी के कर्म फल की भी रचना नहीं करते

भावातीत में हुआ कर्म मुक्ति का द्वार है

कामना दुष्पूर होती हैं

काम - कामना एवं क्रोध – लोभ में एक ऊर्जा होती है

राजस गुण के तत्त्व हैं काम . कामना क्रोध एवं लोभ

काम के सम्मोहन में आ कर मनुष्य पाप कर्म करता है


=====ओम्======


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