Thursday, September 9, 2021

पतंजलि समाधि पाद का समापन

 आज पतंजलि योग दर्शन के 04 पादों में से पहला पाद समाधि पाद पूरा हो रहा हुआ ।

पाद के अंत में असम्प्रज्ञात समाधि और धर्ममेघ समाधि से परिचय हुआ । 

आगे अब हमारी यात्र साधन पाद की होने वाली है जिसमें 55 सूत्र हैं।

समाधि की अनुभूति की जिज्ञासा हर ऐसे लोगों में होती है  जिनमें सात्त्विक गुण की ऊर्जा बह रही होती है लेकिन इस अनुभूति को कैसे प्राप्त करें ? इस प्रश्न का उत्तर साधन पाद में मिलेगा ।

योगानंद बहुत से सिद्ध योगियों में अपने प्रारंभिक जीवन को गुजारा और सबसे यही कहते थे कि आप हमें समाधि क्यों नहीं  देते ?

योगानंद के इस प्रश्न का उत्तर महाशय जी के शिष्य सिद्ध योगी श्री रामगोपाल मजूमदार जी निम्न प्रकार से देते हैं ।

#  जिस समय योगानंद जी श्री रामगोपाल मजूमदार से मिलते हैं उस समय वे 11 वीं के क्षात्र थे ।

# श्री रामगोपाल जी कहते हैं , जैसे अगर 220 बोल्ट बल्ब के अंदर यदि 440 बोल्ट की बिजली प्रवाहित कर दी जाय तो वह बल्ब भष्म बन जाएगा वैसे जहाँ और जैसी स्थिति में तुम्हारा शरीर और तुम हो , यदि समाधि दे दी जाय तो तुम्हारी भी वही हालत होगी ।

🕉️  मेरे मित्र ! समाधि में तुम्हें तुम्हारे गुरु श्री युक्तेश्वर जी भी उतार सकते हैं लेकिन अभीं तुम तैयार नहीं हुए हो । तुम अपने गुरु से भागो नहीं , उनकी ऊर्जा को पीते रहो और जब उन्हें ऐसा लगने लगेगा कि अब तुम तैयार हो , तुम्हें समाधि में उतार देंगे।

पतंजलि अपने साधन पाद में अष्टांग योग माध्यम से समाधि में उतारते हैं , कैसे ? अगले कुछ अंको में आप देख सकेंगे ।

अब देहिये स्लाइड को ⬇️




Wednesday, September 8, 2021

पतंजलि योग सूत्र में सम्प्रज्ञात समाधि

 मनुष्य सबकुछ होते हुए भी इतना अतृप्त क्यों है ? आखिर हम चाहते क्या हैं ? इस तरह के मौलिक प्रश्नों के सम्बन्ध में हर एक मनुष्य  को एकांत में  बैठ कर सोचना चाहिए ।

सांख्य और पतंजलि के अनुसार हम प्रकृति और पुरुष के योग से हैं। पुरुष चेतन और प्रकृति जड़ है । जब पुरुष प्रकृति से मिलता है , प्रकृति विकृत हो उठती है और 23 तत्त्वों के पुरुष बध जाता है । प्रकृति अपनें 23 तत्त्वों के अनुभव के बाद पुरुष को चाहती है कि वह अपनें मूल स्वरूप में आ जाय और वह जब यह समझ लेती है कि पुरुष उसे देख लिया है , वह अपनें मूल स्वरूप अर्थात तीन गुणों की साम्यावस्था में आ जाती है ।

प्रकृति पुरुष को कैवल्य में पहुँचाना चाहती है और पुरुष प्रकृति को देखना चाहता है । जब पुरुष प्रकृति के 23 तत्त्वों से मुक्त हो जाता है तब उस स्थिति को परा वैराग्य की स्थिति कहते हैं जहाँ से कैवल्य की यात्रा समाधि माध्यम से शुरू होती है ।

कैवल्य की यात्रा का माध्यम स्थिर वैराग्य और स्थिर वैराग्य में बार - बार समाधि घटित होना होता है ।

समाधि में पहले हम सबीज समाधि या साकार समाधि या सम्प्रज्ञात समाधि को देख रहे हैं ।

आइये देखते हैं निम्न दो स्लाइड्स को ⬇️





Monday, September 6, 2021

पतंजलि योग सूत्र में समाधि क्या है ?

 महर्षि पतंजलि मूलतः 03 प्रकार की समाधियों का वर्णन करते हैं । अगर ध्यान से समझा जाए तो ये समाधियों के प्रकार नहीं , समाधि के चरण हैं । पहला चरण सम्प्रज्ञात समाधि नाम से जाना जाता है जिसमें चित्त की वृत्तियां शांत रहती है और चित्त शून्य अवस्था में होता है। इस समाधि में राजस - तामस गुणों की वृत्तियां शांत रहती हैं लेकिन सात्त्विक गुण की वृत्तियां सक्रिय रहती हैं ।

दूसरा चरण है असम्प्रज्ञात समाधि का जिसमें तीनों गुणों की वृत्तियां शांत रहती हैं ।

तीसरा समाधि का चरण है - धर्ममेघ समाधि । इस चरण में तीन गुणों की वृत्तियां शांत रहती हैं और संस्कार भी निर्मूल हो गया होता है अर्थात चित्त पारदर्शी निर्मल  और पूर्ण शांत रहता है । यहाँ प्रकृति माध्यम से देह में स्थित पुरुष को अपनें मूल स्वरूप का पूरा बोध हो गया होता है और प्रकृति यह समझ कर कि पुरुष उसे देख चुका है , वह साम्यावस्था में लौट आती है ।

अदः देखिये स्लाइड्स को ⬇️




Sunday, September 5, 2021

अष्टांग योग समाधि के कुछ तत्त्व

 आगे हमारी यात्रा पतंजलि योग सूत्र दर्शन के साधन पाद की प्रारम्भ होने वाली है । अभीं तक हम समाधि पाद की यात्रा में चित्त वृत्ति निरोध से समाधि तक के हर पड़ाओं से परिचित होते रहे हैं । अब हम यहाँ अष्टांग योग की समाधि से सम्बंधित कुछ तत्त्वों को समझते हैं क्योंकि इन तत्त्वों को समाधि पाद में हम नहीं देख पाए थे जबकि समाधि पाद की समाधि अष्टांग योग - समाधि होती है ।

आइये ! देखते हैं अष्टांग योग के कुछ अंगों को जिनका सीधा संबंध समाधि पाद की समाधि से है ⬇️




Saturday, September 4, 2021

योगदर्शन में चित्त योग साधना की मूल है

 योगदर्शन और सांख्य दर्शन में चित्त एक ऐसा तत्त्व है जो स्वयं तो जड़ है लेकिन पुरुष और प्रकृति की संयोग भूमि है । चित्त के माध्यम से पुरुष प्रकृति के 23 तत्त्वों को समझ कर स्वयं के मूल स्वरुप को समझ जाता है और जब ऐसी घटना घटती है जब वह योगी महाविदेहा स्थिति में होता है अर्थात Out of body experiencing में होता हुआ समाधि में डूबा होता है । 

यहाँ वह समझता और देखता है कि वह कौन है और पहले वह स्वयं को क्या समझ बैठा था । अष्टावक्र गीता और उपनिषदों में नेति - नेति की पराकाष्ठा  ही महाविदेहा की स्थिति होतो है ।

अब हम पतंजलि कैवल्य पाद में कुछ सुत्रों के आधार पर चित्त को समझते हैं , निम्न स्लाइड्स की मदद से ⬇️




Friday, September 3, 2021

योगदर्शन में चित्त क्या है ?

 पतंजलि योग दर्शन कैवल्य पाद के कुछ चित्त सम्बंधित सूत्र ⬇️



Thursday, September 2, 2021

पतंजलि ,सांख्य , गीता और भागवत में चित्त क्या है ? भाग - 1

 पतंजलि योगसूत्र समाधि पाद के पूरे 51 सुत्रों से हम मैत्री स्थापित कर राग से वैराग्य , वैराग्य में समाधि और समाधि में बस कर आगे की यात्रा करने की अब तैयार कर रहे हैं । 

योग - यात्रा का माध्यम चित्त है । चित्त से पुरुष भोक्ता है और भोग की गहरी अनुभूति से वह तृप्त होंकर अपनें मूल स्वभाव में लौटना चाहता है । 

प्रकृति यह समझ कर तृप्त हो जाती है और अपनी साम्यावस्था में आ जाती है कि पुरुष उसे देख लिया है । पुरुष प्रकृति के 23 तत्त्वों को समझ कर अपने मूल  स्वरुप में लौट आता है लेकिन अभीं भी पुरुष मोक्ष प्राप्ति नहीं कर पाता । मोक्ष के लिए उसे और आगे की यात्रा करनी पड़ती है जब वह संस्कारों के बंधन से मुक्त होता है जिसे धर्ममेघ समाधि कहते हैं  । धर्ममेघ समाधि के सम्बन्ध में हम आगे कुछ यात्रा पूरी करने के बाद समझ सकेंगे ।

💐अभीं हम चित्त के स्वाभाव , वृत्तियॉं , परिणाम और धर्म जैसी बातों को देखने का प्रयाश कर रहे हैं ।

अब स्लाइड को देखते हैं ⬇️



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