Wednesday, March 30, 2011

अध्याय तीन






गीता- सूत्र 5.7



प्रभु कह रहे हैं--------



कर्म – योगी वह है जो कर्म बंधनों से मुक्त हो ।



The Supreme Lord Krishna says ------



Karma – Yogin is that who is not attached to actions .



कर्म – बंधन क्या हैं ?



सात्त्विक , राजस एवं तामस गुण जब मनुष्य को एक यन्त्र कि भाति चला रहे हों तब वह


ब्यक्ति गुणों के प्रभाव में जो कुछ भी करता है , वह उन कर्मों का गुलाम होता है



कर्म – बंधन हैं ….....


आसक्ति


कामना


क्रोध


लोभ


मोह


भय


अहंकार


और -------


जो कर्म इनके प्रभाव में होते हैं उन कर्मों में वह ऊर्जा होती है


जो करनें वाले को गुलाम बना लेती है




=====ओम=======


Thursday, March 24, 2011

कर्म के प्रकार




यहाँ गीता अध्याय – 03 के सूत्र – 3.17 – 3.18 के सन्दर्भ में आगे देखनें जा रहे हैं ----



कर्म के प्रकार :

यहाँ हमें देखना है गीत सूत्र - 18.23 से 18.25 तक के तीन सूत्रों को

सूत्र कह रहे हैं ======

आसक्ति … ...

क्रोध … ......

लोभ … .....

मोह … .....

---एवं-----

अहंकार के प्रभाव में जो कर्म होते हैं वे राजस एवं तामस कर्म होते हैं

- -- और -----जो कर्म चाह रहित , अहंकार रहित एवं किसी बंधन के बिना होते हैं वे … ....

सात्त्विक कर्म होते हैं


यहाँ इतनी सी बात ध्यान में रखनी है की-----

हम इन सूत्रों को अर्जुन के प्रश्न [ यदि ज्ञान कर्म से उत्तम है तो आप मुझ को कर्म में क्यों उतारना चाहते हैं ] के सन्दर्भ में देख रहे हैं

और ----- कर्म क्या है ? इस बात को अध्याय – 08 में पहुंचनें के पहले देख रहे है

अध्याय – 08 सूत्र

तीन में प्रभु कर्म की परिभाषा देते हैं


कर्म की परिभाषा है-----


भूत भाव : उद्भव कर : विसर्ग : इति कर्म :


===== =======



Tuesday, March 22, 2011

गुण एवं कर्म विभाग



गीता - सूत्र 3.28


गुण विभाग – कर्म विभाग का बोध ही तत्त्व – वित्तु होना है


क्या है गुण विभाग

और

क्या है कर्म विभाग ?


गुण विभाग – कर्म विभाग की चर्चा वेदों में विस्तार से है

वेद कहते हैं ------

प्रभु से प्रभु में तीन गुणों का एक माध्यम है जो साश्वत है , समयातीत है , सीमा रहित है

यह माध्यम ही माया कहा जाता है माया टाइम – स्पेस की रचना करती है और टाइम – स्पेस

में जीव – निर्जीव एवं जड़ – चेतन सभी हैं

माया तो जन्म – मृत्यु से परे है लेकिन जो माया से है वह जन्म – मृत्यु में सीमित होता है

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में ऐसी कोई सूचना नहीं और ऎसी कोई जगह नहीं जहां तीन गुणों का प्रभाव

न हो


माया से माया में दो प्रकृतियाँ हैं ; जड़ एवं चेतन या अपरा एवं परा

जड़ प्रकृति में आठ तत्त्व होते हैं ; पञ्च महाभूत , मन , बुद्धि एवं अहंकार और परा प्रकृति

चेतना है

जड़ एवं चेतना प्रकृतियों से सभी सूचनाएं हैं जिनमें मनुष्य भी आत है

प्रकृति से इन्द्रियों एवं मन द्वारा जो कुछ भी ग्रहण किया जाता है उस से हमें तीन गुणों की

कुछ – कुछ मात्राएँ मिलती हैं यह मात्राएँ हमारा स्वभाव का निर्माण करती हैं एयर स्वभाव से

कर्म होता है

गुण कर्म करता है और मनुष्य तो मात्रा यंत्रवत एक माध्यम है जो लोग स्वयं को करता समझते हैं

उन पर अहंकार का गहरा प्रभाव होता है


कर्म और गुण का जो सम्बन्ध ऊपर अभी स्पष्ट किया गया उसे ही ------

गुण विभाग एवं कर्म विभाग की संज्ञा दी गयी है , हमारे वेदों में

गीता में यहाँ यह बात वेदों एवं सांख्य – योग से ली गयी है


==== ======


Monday, March 21, 2011

गीता अध्याय - 03

दो सूत्र और ------

गीता सूत्र - 3.17 + 3.18

आत्मा केन्द्रित ब्यक्ति पूर्ण रूप से मुक्त होता है ;
वह किसी का गुलाम नहीं होता और वह कर्तब्य मुक्त भी होता है ॥

यहाँ गीता सूत्र - 4.18 को भी देखिये -----

आत्मा केन्द्रित ब्यक्ति ........
कर्म में अकर्म और ----
अकर्म में कर्म देखता है ॥

कुछ देखिये ----
कुछ पढ़िए ----
और कुछ देर गीता में दुबे रहनें का अभ्यास करें ......
तब आप ----
परम सत्य में रहने का .....
आनंद उठा सकते हैं ॥
==== ॐ ======

Sunday, March 20, 2011

गीता अध्याय - 03




गीता के तीन और श्लोक -----

श्लोक .......
3.19 + 3.20 + 5.10
यहाँ श्लोक कह रहे हैं -------

आसक्ति रहित कर्म , कर्म सिद्धि के माध्यम हैं ॥
राजा जनक आसक्ति रहित कर्म करते हुए विदेह कह लाये ॥
ऐसा कर्म प्रभु - मार्ग होता है ॥

क्या कर्म जो हम करते हैं वह बिना आसक्ति हो , ऐसा संभव भी है ?
कौन और क्यों ऐसा कर्म करेगा जिसके करनें के पीछे कोई सोच न हो ?
गीता जिस कर्म की बात करता है वह कर्म - योग है
और ......
ऐसा कर्म मात्र वह कर सकता है जो गुणों के गुरुत्व से परे बसेरा बनाया हुआ हो ॥


जे कृष्णामूर्ति और चन्द्रमोहन रजनीश यही कहते रहे की ........

moment to moment जीवो ----
जीवन का हर पल होश मय होना चाहिए ------
भूत और भविष्य की सोच तो एक भ्रम है .........
वर्तमान में जीवन है .........
आदि - आदि ॥
ये जो बातें कही जा रही हैं उनका सम्बन्ध साधना से दूर - दूर तक नहीं है ,
ये बातें तो .....
साधाना के फल हैं ॥
जैसे गीता कहता है की ......
आसक्ति रहित कर्म करना चाहिए अर्थात जो कर्म हो रहा है उसमें यह होश बनाओ की -----
यह काम तुम क्यों कर रहे हो ?
इसका जो परिणाम होगा उसे तुझे ही भोगना है ,
करतेकरते यदि इस प्रकार कुछ अहम् बातों को गहराई से सोचा जाए तो ......
वह कर्म करता , वहीं पहुंचता है .......
जहां की बात ......
जे कृष्णामूर्ति और रजनीश कहते हैं ॥

===== ॐ ======


Friday, March 18, 2011

गीता अध्याय - 03

यहाँ हम इन्द्रिय , बिषय और स्वभाव के संबंधमें
गीता के कुछ सूत्रों को देखते हैं :

सूत्र - 2.14 + 5.22

इन्द्रिय - बिषय के सहयोग से जो सुख मिलता है उस सुख में
दुःख का बीज होता है और
ऐसा सुख या दुःख क्षणिक होता है
सूत्र - 18.38

इन्द्रिय - बिषय के सहयोग से जो सुख मिलता है वह भोग के समय
तो अमृत सा लगता है पर उसका परिणाम बिष मय होता है ॥

सूत्र - 3.8

सभी कर्म दोष युक्त होते हैं [ सूत्र - 18.48] लेकीन नियत कर्मों को करते रहना चाहिए और इनके करनें में कर्म - बंधनों के प्रति होश बनाना ही , कर्म - योग होता है ॥


TE
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यह वह जगह है जहां राजा कर्ण की सेना
महाभारत - युद्ध के समय ठहरी थी


===== ॐ ======

Thursday, March 17, 2011

गीता अध्याय - 03




गीता सूत्र - 3.5 के साथ इन सूत्रों को भी देखिये -----

सूत्र - 3.27 + 3.33 + 18.59 + 18.60

गीता के इन चार सूत्रों का भाव है .......

तीन गुण मिल कर स्वभाव का निर्माण करते हैं -------
स्वभाव से मनुष्य कर्म करता है ----
कर्म में मैं का होना अहंकार का सूचक है ॥

As mentioned above , the gita - four verses say .......

three natural modes form the nature of beings ,
nature of an indivisual is resposible for the type of action he performs .
presence of feeling in the action that i did this or that, is the indication of
ego .

गीता का यह अध्याय कर्म - योग की बुनियादी बातों को बताता है
अतः आप यहाँ एक - एक सूत्र को गंभीरता
से पकडनें का अभ्यास करें ॥

यहाँ हम मात्र अध्याय तीन पर आश्रित नहीं है कर्म - योग से सम्बंधित
सम्पूर्ण गीता के सूत्र
आप को यहाँ मिलनें वाले हैं ,
यह आप पर निर्भर है की ......
आप इन सूत्रों से क्या निकालते हैं ॥

View Larger Map==== ॐ ======

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