Sunday, February 24, 2013

गीता ज्ञान - 12

गीता श्लोक - 4.19 

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः 
ज्ञान अग्निदग्धकर्माणम् तम् आहु : पण्डितम् बुधाः 

अर्थ 

जिसके कर्म में काम - संकल्प की ऊर्जा न हो ....
उनके सभी कर्म ज्ञान अग्नि में भस्म हो गए होते हैं ....
और उनको ज्ञानी जन पंडित कहते हैं 

" Action without desire and determination is a way leading to awareness and wisdom ."

बिना कामना 
बिना संकल्प 
जो कर्म होता होगा वह किस ऊर्जा से  होता होगा ?

गीता कहता है : 

मनुष्य कर्म कर्ता नहीं है , मनुष्य तो उस कर्म का द्रष्टा है जो उसके द्वारा तीन गुण समय - समय पर करवाते रहते हैं और जो यह समझता है कि मैं अमुक कर्म को कर रहा हूँ , वह उस समय अहँकार के सम्मोहन में होता है / 
गीता के एक श्लोक को  ठीक  से समझनें के लिए एक बार नहीं अनेक बार आप को सम्पूर्ण गीता में प्रश्नों के आधार पर अध्यान करना होगा /
 गीता के सभीं श्लोकों का अर्थ गीता में खोजना , गीता ध्यान है
 और
 गीता के श्लोक का तर्क - वितर्क के आधार पर अर्थ प्रस्तुत करना अज्ञान है / 
गीता आगे कहता है :
आसक्ति रहित कर्म से निष्कर्मता की सिद्धि मिलती है .....
जो 
ज्ञान - योग की परा  निष्ठा है ....
अर्थात --
कर्म जब कर्म - योग बन जाता है तब ज्ञान की प्राप्ति होती है ...
और ज्ञान की ऊर्जा जब मन - बुद्धि में प्रबाहित होती है तब अन - बुद्धि संदेह रहित होते हैं //

==== ओम् ====

Tuesday, February 12, 2013

गीता ज्ञान - 11

गीता अध्याय - 03 आधारित 

पिछले अंक में हमनें देखा कि अध्याय - 03 अर्जुन के दो प्रश्नों से सम्बंधित है ; अर्जुन अपनें पहले प्रश्न में जानना चाहते हैं ----
यदि ज्ञान , कर्म से उत्तम है तो आप मुझे कर्म में क्यों उतारना चाह रहे हैं ?
और अर्जुन दूसरे प्रश्न के माध्यम से यह जानना चाहते हैं कि -----
मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है ?

प्रश्न दो के सन्दर्भ में हम पिछले अंक में देख चुके हैं / यहाँ इस सन्दर्भ में  प्रभु कहते हैं .....
जब मनुष्य के अंदर काम - ऊर्जा का सम्मोहन सघन हो जाता है तब मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की सोच नहीं रह जाती और वह जो भी करता है उसे वह परम समझता है /

अर्जुन यह क्यों कह रहे हैं कि जब ज्ञान कर्म से उत्तम है तो आप मुझे कर्म में क्यों उतार रहे हैं ?

यहाँ हमें गीता श्लोक 2.49 एवं श्लोक - 2.50  को देखना होगा जो इस प्रकार है :-----

गीता श्लोक - 2.49 

दूरेण हि अवरम् कर्म बुद्धियोगात् धनञ्जय 
बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः 

गीता श्लोक - 2.50 

बुद्धियुक्ता : जहाति इह उभे सुकृतदुष्कृते 
तस्मात् योगाय युज्यस्य योगः कर्मसु कौशलम् 


  • कर्म फल की चाह  से किया गया कर्म दीन लोगों का होता है और बुद्धि से किया हुआ कर्म उत्तम होता है 
  • बुद्धि से जो कर्म करते हैं वे पुण्य - पाप से परे रहते हैं और बुद्धि - योग में हो रहे कर्म की गुणवत्ता भी उत्तम होती रहती है / 

गीता के इन दो सूत्रों के भाव अर्जुन कुछ इस प्रकार से समझते हैं -----

ज्ञान [ बुद्धि ] भौतिक कर्म से उत्तम है और ज्ञान शात्रों के मध्यम से होता है अर्थात वह जो शास्त्रों में लिखा है , उसे याद करना और लोगों को सुनाना ही ज्ञान है जिसके लिए कर्म की क्या आवश्यकता ? अर्जुन का यह अर्थ पूर्ण रूप से उनके पक्ष में है जिसके आधार पर वे युद्ध से बच सकते हैं और अर्जुन चाहते भी यही हैं कि किसी न किसी तरह कोई मार्ग प्रभु के बचनों में मिल जाए जिसके आधार पर युद्ध से बचा जा सके / 

पर प्रभु कह रहे हैं -----

युद्ध करो , युद्ध करनें की अवधि में अपनें को कर्ता से द्रष्टा बना लो जहाँ यंत्रवत तुम कर्म तो करते रहोगे लेकिन उस कर्म के होनें के पीछे कोई चाह न होगी , तुम्हारी बुद्धि समभाव में होगी और समभाव में जो कर्म होता है उसके होनें का सम्बन्ध पुण्य - पाप से परे होता है / 


  • चाह - अहँकार की ऊर्जा से जो होता है , वह भोग कर्म है ....
  • चाह - अहँकार रहित ऊर्जा से जो होता है वह योग - कर्म होता है ....
  • भोग कर्म का आधार  द्वैत्य है जैसे पुण्य - पाप , अच्छा - बुरा .....
  • भोग कर्म में भोग तत्त्वों की साधना का नाम है कर्म योग .....
  • कर्म योग का फल है ज्ञान प्राप्ति .....

ज्ञान वह है जो समभाव में रखता हो 
ज्ञान वह है जो सत्य को दिखाता हो 
ज्ञान वह है जो प्रकृति - पुरुष का द्रष्टा बनाता हो 
ज्ञान वह है जो ब्रह्मवित् की स्थिति में रखता हो 

भोग से योग ----
योग में ज्ञान ----
ज्ञान से प्रकृति - पुरुष का बोध ....
और 
ज्ञान से आत्मा के माध्यम  से परमात्मा में बसेरा बनाना 

आज इतना ही

==== ओम् =====


Wednesday, February 6, 2013

गीता ज्ञान - 10

गीता अध्याय - 03 

परिचय 


  1. इस अध्याय में तीन अर्नुज के और चालीस प्रभु  श्री कृष्ण के श्लोक हैं 
  2. इस अध्याय में अर्जुन के दो प्रश्न हैं :

[ क ] 
कर्म से उत्तम यदि ज्ञान है तो आप मुझे इस युद्ध रूपी घोर कर्म में क्यों उतारना चाह रहे हैं ?
[ ख ] 

  • मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है ?
  • इस अध्याय में कुल 22 ध्यान सूत्र हैं :

[1 ] काम [ sex energy ] सम्बंधित सूत्र संख्या         = 07 
[ 2 ] इंद्रिय - बिषय सम्बंधित सूत्र                          = 04
[ 3 ] कर्म एवं तीन गुण सबंधित सूत्र                       = 10
[ 4 ] आत्मा केंद्रित योगी से सम्बंधित सूत्र               = 01

[ 1 ] काम [ sex energy ] सम्बंधित सूत्र 

सूत्र - 3.37 से 3.43 तक 
गीता में प्रभु इन सूत्रों के माध्यम  से क्या कह रहे हैं ?
प्रभु कह रहे हैं -----

  • काम और क्रोध एक ऊर्जा के दो रूप हैं और उस ऊर्जा का नाम है राजस गुण 
  • जैसे धुएं से अग्नि , जेर से गर्भ और मेल से दर्पण ढक जाता है वैसे काम के प्रभाव में ज्ञान को अज्ञान ढक लेता है 
  • काम भोग से तृप्त नहीं होता 
  • काम का सम्मोहन इंद्रिय , मन एवं बुद्धि पर रहता है 
  • काम से अप्रभावित ब्यक्ति आत्मा केंद्रित होता है 

आज इतना ही 

=== ओम् ====

Thursday, January 31, 2013

गीता ज्ञान - 09

कर्म और ज्ञान 

गीता श्लोक - 3.1 - 3.3 

श्लोक - 3.1 
ज्यायसी चेत् कर्मणः ते मता बुद्धिः जनार्दन 
तत् किम् कर्मणि घोरे माम् नियोजयसि केशव 

" यदि कर्म की अपेक्षा ज्ञान [ बुद्धि ] उत्तम है तो फिर आप मुझे इस घोर कर्म में क्यों उतारना चाह रहे हैं ?"
यह बात अर्जुन प्रभु श्री कृष्ण से कह रहे हैं
श्लोक - 3.2
आप के मिले  हुए वचन मेरी बुद्धि को सम्मोहित कर रहे है , मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए , अतः आप मुझे स्पष्ट रूप से उसे बताएं जो मेरे हित में हो , यह बात अर्जुन कह रहे हैं 
श्लोक - 3 
लोके अस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया अनघ 
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानाम् कर्मयोगेन योगिनाम् 
प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं ......
 दो रास्ते हैं जिनसे सत्य की खोज संभव है ; एक रास्ता उनका है जो बुद्धि केंद्रित हैं , जो तर्क - वितर्क के आधार पर सत्य को समझना चाहते हैं और अन्य जिनका  केंद्र बुद्धि नहीं है उनके लिए क र्म-  योग मार्ग है / 

यहाँ तीन  बातें हैं ------

  • सत्य की खोज 
  • ज्ञान मार्ग 
  • कर्म योग 

सत्य की खोज क्या है ? 
सत्य की खोज वह है जिसको समझनें के बाद मनुष्य परमानंद की स्थिति में आ जाता है और वह प्रकृति एवं प्रकृति के मूल पुरुष का द्रष्टा बन जाता है और वह स्वयं का भी द्रष्टा होता है /

कर्म एवं कर्म - योग 
तन , मन एवं बुद्धि के माध्यम से मनुष्य की ऊर्जा का खर्च होनें का जो हेतु है उसे कर्म कहते हैं /कर्म के बिना कोई भी जीवधारी एक पल भी नहीं राह सकता / ऐसे कृत्य जिनके होने के पीछे भोग - भाग हो , उसे भोग कर्म कहते हैं और ऐसे कृत्य जीके होनें के पीछे परमात्मा को समझनें की जिज्ञासा हो उनको कर्म - योग कहते हैं / ब
भोग कर्मों में जब भोग तत्त्वों की अनुपस्थिति होती है तब वे कर्म योग हो जाते हैं और इस यात्रा की सफलता का फल है ज्ञान / भोग से योग , योग में ज्ञान की प्राप्ति , यह है साधना का सूत्र / गीता में प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं , वह जिससे क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का बोध हो , उसे ज्ञान कहते हैं [ गीता - 13.2 ] / 
मनुष्य मात्र एक ऐसा प्राणी है जो भोग से योग में उतर कर ज्ञान प्राप्ति से  प्रभु की अनुभूति से गुजर कर आवागमन से मुक्त हो सकता है /  मनुष्य की योनि प्राप्त करना उस स्थिति को प्राप्त करना है जहाँ से प्रभु में उड़ान भरना  संभव है / 
आइये ! 
आज  आप आमंत्रित हैं गीता के माध्यम से परम में उड़ान भरनें को , आप इस उड़ान के लिए अपनें तन .मन एवं बुद्धि से वायुयान का निर्माण कर सकते हैं / जब ध्यान से तन , मन एवं बुद्धि निर्मल हो जाते हैं तब मनुष्य का क्षेत्र वह वायुयान बन जाता है जिससे वह निर्वाण प्राप्त करता है // 

==== ओम् ======

Thursday, January 24, 2013

गीता ज्ञान - 08

जीव रचना 

[ अगला चरण ]

गीता श्लोक - 14.3 , 14.4 

मम योनिः महत् ब्रह्म तस्मिन् गर्भम् दधामि अहम्  / 
संभवः सर्वभूतानां ततः भवति भारत                    //

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः           / 
तासां ब्रह्म महत् योनिः अहम् बीजप्रदः पिता        // 

भावार्थ :-----

सभी योनियों से जो जीव उत्पन्न हो रहे हैं उनके पिता स्वरुप बीज प्रदाता मैं हूँ और महत् ब्रह्म उनके गर्भ धारण करनें की योनियाँ हैं /

भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं : -----

जीवों के बीजों का प्रदाता मैं हूँ .....
जीवों को जो धारण करता है , वह ब्रह्म है ....

अभीं तक जीव के होनें के सिद्धांत के सम्बन्ध में गीता के निम्न सूत्रों को हम देख चुके हैं -----
7.4 - 7.6 
9.20 - 9.22
13.4 - 13.5 , 13.20 
14.3 - 14.4 
और इन श्लोकों में हमें निम्न शब्द मिले :-----

  • पञ्च महाभूत [ पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश ]  
  • पञ्च बिषय
  • दश कार्य + तेरह करण 
  • प्रकृति - पुरुष [ दो प्रकृतियाँ ; अपरा + परा ] 
  • ब्रह्म 
  • आत्मा [ जीवात्मा ] 
  • श्री कृष्ण 

और ....

गीता में हमनें यह भी देखा , प्रकृति - उरुष दोनों अज हैं
अब आप के सामनें जीवों की रचना का तत्त्व - विज्ञान है , आप इसके सम्बन्ध में स्वयं कुछ सोचें
==== ओम् =======

Monday, January 14, 2013

गीता ज्ञान - 07

क्षेत्र की रचना 

[ जीव के देह की रचना ] 

गीता श्लोक - 13.5 - 13.6

महाभूतानि अहंकार : बुद्धिः अब्यक्तम् एव च /
इन्द्रियाणि दश एकं च पंच च इंद्रियगोचरा : //

इच्छा द्वेष : सुखं दुःखम् संघात चेतना धृतिः /
एतत् क्षेत्रं समासेन सविकारम् उदाहृतम्     //

" पांच महाभूत [ पृथ्वी ,जल , वायु ,अग्नि , आकाश ] , मन , बुद्धि , अहँकार , दश इन्द्रियाँ , पांच इंद्रिय बिषय , इच्छा , द्वेष , सख - दुःख , धृति , स्थूल देह का पिण्ड के अन्य तत्त्व , सभीं विकार एवं ----
चेतना - अब्यय से इस क्षेत्र की रचना की बात कही गयी है "

यह बात अर्जुन को प्रभु श्री कृष्ण उस बात को बता  रहे हैं जिसकी चर्चा ब्रह्म सूत्र एवं वेदों में की गयी है / 
इस सम्बन्ध में आप पहले गीता श्लोक - 9.10 , 13.20 , 7.4 - 7.6 तक को देख चुके हैं / 

इस सम्बन्ध में गीता की कुछ और बातों को हम अगले अंक में देखेंगें //

==== ओम् =====


Wednesday, January 9, 2013

गीता ज्ञान - 06

जीवों की रचना 

गीता श्लोक - 7.4 - 7.6 
यहाँ प्रभु अपनें तीन सूत्रों के माध्यम से कह रहे हैं : ----
दो प्रकृतियों से सभीं जीब हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव - प्रलय हूँ [ सूत्र - 7.6 ] 
और
सूत्र - 7.4 एवं सूत्र - 7.5 में कहते हैं .....
भूमि 
जल 
अग्नि 
वायु 
आकाश 
मन , बुद्धि एवं अहँकार ...
ये आठ अपरा अपरा प्रकृति के तत्त्व हैं
और 
इनके परे एक परा प्रकृति है जिसे चेतना  कहते हैं और जिससे मैं जगत को धारण किये हुए हूँ / चेतना वह तत्त्व है जो जीव को धारण करता है /

यहाँ गीता का श्लोक - 13.19 को भी देखते हैं जो कहता है -----

प्रकृति एवं पुरुष दोनों अनादि हैं , सभीं तीन गुणों के तत्त्व एवं विकार प्रकृति जन्य हैं / 

गीता श्लोक - 9.10 में हमनें पिछले अंक में देखा था जहाँ प्रभु कहते हैं , प्रकृति  रचनाकार है अर्थात संसार के सभीं चर - अचर  प्रकृति से रचित हैं अर्थात ऐसा कोई चर - अचर  नहीं जिस पर गुणों का प्रभाव न हो अर्थात जो निर्विकार हो /
गीता श्लोक - 18.40 में भी प्रभु कहते हैं , हे अर्जुन पृथ्वी , आकाश एवं अन्यत्र ऎसी कोई भी सूचना नहीं जिस पर गुणों की छाया न पड़ती हो /

गीता ऊपर दिए गए सूत्रों के माध्यम से बता रहा है ------


  • जो हैं सब प्रकृति से हैं 
  • प्रकृति प्रभु से है 
  • सभीं विकार प्रकृति से हैं 
  • प्रकृति विकार मुक्त हो नहीं सकती 
  • प्रभु से सभीं विकार हैं , लेकिन प्रभु निर्विकार हैं 

साधना , ध्यान , तप , सुमिरन , योग एवं अन्य सभीं ऐसे माध्यम  हैं जिनसे प्रकृति निर्मित विकारयुक्त मनुष्य अपनें को निर्मल करता रहता रहता है और जब उसकी निर्मलता पूर्ण होती है तब वह स्वयं प्रभु जैसा बन जाता है और निर्वाण प्राप्त करता है / गीता श्लोक - 5.11 में प्रभु कहते हैं , हे अर्जुन ! कर्म योगी अपनें
 तन , मन एवं बुद्धि से जो भी करता है वह उसे निर्मल बनाता रहता है /

==== ओम् =====

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