Sunday, January 26, 2014
कर्म - ज्ञान मार्ग
गीता मोती - 16
Saturday, January 11, 2014
गीता मोती - 15
● रोज देख रहे हो लेकिन ... ? भाग - 1
<> मंदिर त्रिवेणी हैं , जहाँ तीन प्रकारकी उर्जायें बह रही हैं , एक मंदिर के गर्भ गृहके मध्य स्थित मूर्ति से विकिरण द्वारा फ़ैल रही परम सनातन प्राणमय उर्जा है जो मंदिर के द्वार पर टंग रहे घंटेके माध्यम से सभीं दिशाओं में फ़ैल रही है । दूसरी उर्जा उन ब्यक्तियों की होती है जो मंदिर में प्रवेश करते हैं । तीसरी उर्जा उनकी होती है जो मंदिर में प्रवेश कर्ताओं के आश्रित हैं और मंदिर के बाहर खड़े रहते हैं । जो मंदिर के बाहर खड़े हैं ,जिनको भिखारी कहा जता है , उनको मंदिरके अन्दर स्थित मूर्ति से कुछ लेना -देना नहीं ,उनको मंदिर में प्रवेश करनें वालों से भी कोई ख़ास प्रयोजन नहीं होता ,उनकी पूरी उर्जा उस बस्तु पर टिकी होती है जो मंदिर में प्रवेश कर्ताओं के हांथों में दान के लिए होती हैं । मंदिर दो भिखारियों और एक सनातन उर्जाका त्रिवेणी है ।
* मंदिर के अन्दर और बाहर दोनों तरह भिखारी हैं ,मंदिरके अन्दर प्रवेश कर्ता पत्थर की मूर्ति से वह मांग रहा है जिसे वह अभीं प्राप्त करनें की चाह में है । मंदिरके बाहर जो खड़े हैं ,जिनके हांथोंमें भिक्षा पात्र लटक रहे हैं ,वे जो मंदिर से बाहर निकल रहे हैं उनसे वह मांग रहे हैं जो इनको उनके हांथों में दिख रहा है , हैं दोनों भिखारी ।
* दो भिखारियों और एक ओंकार की त्रिवेणी हैं हमारे मन से निर्मित मंदिर ।
~~~ॐ ~~~
Wednesday, January 8, 2014
गीता मोती - 14
● कामना , क्रोध और दुःख ●
गीतामें प्रभु कृष्ण कहते हैं :---
* इन्द्रिय - बिषय संयोग से मन उस बिषयके सम्बन्ध में मनन करनें लगता है और मनन का स्वरुप गुण आधारित होता है अर्थात मनन के समय जिस गुण के प्रभाव में मन होता है , मनन जा केंद्र उसी गुण तत्त्व पर होता है । बिषय एक होता है और उस बिषय पर मन तीन प्रकार से मनन कर सकता है ।
* मनन से आसक्ति उठती है : आसक्ति अर्थात उस बिषय के भोग की उर्जा ।
* आसक्ति से संकल्प - कामना का उदय होता है । * कामना टूटने का भय क्रोध पैदा करता है ।
* क्रोध काम - कामना का रूपांतरण है * क्रोध मनुष्य के पतन का करण है ।
* जितनी गहरी कामना होगी , उसके खंडित होनें पर उतना गहरा दुःख होगा ।
* कामना की पूर्ति होना अहंकार को और सघन बनाता है ।
* कामना रहित सन्यासी होता है ।
* सन्यास , वैराग्य और भक्ति एक साथ रहते हैं ।
* परा भक्त प्रभु तुल्य होता है ।
~~ ॐ ~~
Friday, December 13, 2013
गीता मोती - 13
● संसार , प्रभु से प्रभुमें प्रभुकी मायासे निर्मित है। माया तीन गुण और अपरा - परा दो प्रकृतियों से निर्मित है ।माया वह माध्यम है जहाँ हर पल हो रहे परिवर्तन से काल ( time )के रूप में परम,अब्यय , निर्विकार और निराकार प्रभुके होनें का आभाष होता है ।
● काल प्रभु की चाल है और संसारमें हो रहा परिवर्तन ही माया का संकेत है ।
● संसार मनुष्यके लिए एक उत्तम प्रयोगशाला है और अन्य जीवोंके लिए भोजन- प्रजननकी एक नर्सरी है ।
● संसारमें मनुष्यको छोड़ कर अन्य सभीं जीवोंका जीवन काम और भोजन आश्रित है लेकिन मनुष्यके लिए इस संसारमेंभोजन और काम सरल माध्यम हैं जिनके सहयोगसे वह अपनी नीचे बहनें की कोशिश कर रही उर्जा को ऊपर उठाता है और ऊर्जा जब उर्ध्वगामी हो जाती है तब रामकी अनुभूति होती है। मनुष्यकी भोजन और कामकी समझ उसे ध्यानमें प्रवेश कराती है और ध्यान रामका निवास स्थान है । ● काल प्रकृति के परिवर्तन से मायाकी सूचना देता है। ।
● माया ऊर्जा शरीर में बहा रही उर्जा को उर्ध्व गामी होनें नहीं देती और माया की यह रुकावट उर्जा को निर्विकार बना दक्ती है और निर्विकार उर्जा ही होश
है ।
● होशमें बसा हुआ मनुष्य बुद्ध होता है : जब तक होश बना है तबतक वह बुद्ध रूप में माया का द्रष्टा होता है ।
** गीतामें प्रभु श्री कृष्ण अर्जुनको यही सीख देते हैं । ~~ ॐ ~~