Thursday, January 1, 2015

गीता मोती - 38

Gateless gate -the Gita
* Yoga says : There are six layers of energy ; physical ,electrical , mental , emotional , intuitive and soul . Science can detect the first four . Brain - a component of mind , is a place where thaught- waves vibrate and infact brain is an electric field . Emotions are defined as energy in motion ie vibration . The wave -frequency of various emotions vary depending upon the nature of emotions . Love emotion has higher frequency than shame and guilt . Recent experiments in deep meditation show that a meditator having above 200,000 cycles/second subtle energy frequency , experiences the existence of God where as this frequency in ordinary man is about 350 cycles / second . A meditator when reaches deeper in meditation , and his subtle energy frequency crosses 200,000 cycles / second , he feels being out of his own body ,and this state is the gate of Samadhi .
~~ ॐ ~~

Tuesday, December 9, 2014

गीता मोती - 37

https://docs.google.com/file/d/0B4cdxuUAWB2VZHJ6OS1LR2N1R1U/edit?usp=docslist_api

Saturday, December 6, 2014

सुख - दुःख

गीता के मोती - 37
गीता : 18.38 + 5.22
गीता - 18.38 >
" इन्द्रिय सुख भोग काल में अमृत सा भाषता है पर उसका परिणाम बिषके सामान होता है ।"
गीता : 5.22 >
" इन्द्रिय सुख दुःख के हेतु हैं । बुद्ध पुरुष इन्द्रिय सुख में नहीं रमता ।"
* गीताके माध्यम से कर्म - योग और ज्ञान - योगके पहले चरणको प्रभु किस ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं , इस बात पर किया जानें वाला मनन , ज्ञान योग में उतार सकता है और इन सूत्रों की छाया में जो कर्म होंगे , वे कर्म योग की बुनियाद रख सकते हैं ।अब देखते हैं ---
** क्या है , इन्द्रिय सुख ?
पाँच ज्ञान इन्द्रियोंके अपनें - अपनें बिषय हैं ।अपनें - अपनें बिषयों में रमना , इन इन्द्रियोंका स्वभाव है । इन्द्रिय - विषय संयोग से जो उर्जा उठती है , वह उर्जा दो प्रकार में से कोई एक हो सकती है । गुणोंके प्रभावसे उपजी उर्जा भोग में पहुंचाती है जिसके सम्बन्ध में ऊपर के दो सूत्र हैं । और बिना गुणके प्रभाव में वही उर्जा न सुख की अनुभूति से गुजारता है न दुःख की अनुभूति से अपितु समभाव में रखती है । समभाव में जो होता है वह सत्य ही होता है ।
~~~ ॐ ~~~

Monday, November 17, 2014

गीता के मोती - 36

" सत्त्वं रजः तमः इति गुणाः प्रकृतिसंभवः । 
निबध्न्ति महाबाहो देहे देहिनम् अब्ययम् ।।" 
~~ गीता - 14.5 ~~
 * भावार्थ * 
 " प्रकृति के तीन गुण - सात्त्विक ,राजस और तामस,शरीर में अब्यय जीवात्मा को बाँध कर रखते हैं "
 > प्रभु श्री कृष्णके इस सूत्र पर बार -बार मनन करें ।< 
<> यदि जीवात्मा देह में तीन गुणों के कारण है तो फिर गुणातीतके देह में जीवात्माको कौन रोक कर रखता है ? इस प्रश्न के सम्बन्ध देखें , इस सन्दर्भ को :---- 
# परमहंस श्री रामकृष्ण जी प्रवचन देते समय बोलते -बोलते अपनीं रसोई में पहुँच जाया करते थे और माँ शारदा वहाँ पकौड़े आदि जो बना रही होती थी ,उसे उठा कर खाते हुए पुनः शिष्योंके मध्य आ कर प्रवचनको आगे बढ़ाते रहते थे । एक दिन एक अद्भुत घटना घटी । माँ पकौड़े बना रही थी और पकौड़े की गंध से परम हंस जी आकर्षित हो कर आ पहुँचे रसोई में और उठा लिए पकौड़े तथा खाते हुए पुनः शिष्योंके मध्य चल पड़े पर माँ कहनें लगी ," आपको सभीं पागल कहते ही हैं और इस प्रकार पकौड़े खाते हुए प्रवचन देते देख कर कोई भी आपको पागल कह सकता है ।यह बात माँ मजाक में कहा था पर परम हंस जी पकौड़ा खाना बंद कर दिया और मुस्कुराकर माँ से कहा ," जिस दिन तुम पकौड़े लेकर आओगी और मैं तुम्हारी तरफ पीठ कर लूँगा ,उस दिन के बाद तीन हफ़्तों के अन्दर मैं अपनीं देह त्याग दूंगा , खाना ही तो एक बंधन है जो आत्मा को मेरे देह में रोक रखा है लेकिन जिस दिन मेरा काम पूरा हो जाएगा ,यह बंधन भी स्वतः टूट जाएगा । 
* माँ इस बात को गंभीरता से नहीं लिया पर परमहंस जी थीक 27वें दिन वही किया जो बोल था ; माँ बुलाती रही भोजन करनें केलिए पर परमहंस चुपचाप बैठे रहे । माँ जब थाली ले के आई ,परम हंस जी उनकी ओर पीठ कर ली । माँ तो सोचती रही कि मजाक कर रहे हैं पर वे तो अपनें देहको छोड़ रहे आत्माके द्रष्टा बनें हुए थे , माँ ज्योंही उनको हिलाया ,उनका शरीर लुढक गया ।
 ** परम हंस जी कहते थे ," गुणातीत के देह में जीवात्मा तीन सप्ताह से अधिक दिन तक नहीं रहता । "
 # अब पुनः गीता सूत्र : 14.5 को समझें # 
~~~ ॐ ~~~

Tuesday, October 28, 2014

गीता के मोती - 35

# गीता - 3.27 #
 " प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वशः । 
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ।।" 
< शब्दार्थ < 
" प्रकृतिके गुण कर्म करते हैं ,अहंकार प्रभावित स्वयं को कर्ता मानता है " 
 <> इस श्कोल पर खूब मनन कीजिए ,मननके बाद आप भी यही कहेंगे ---- 
" गुण कर्म - कर्ता हैं , कर्ताभाव अहंकारकी छाया है ।।" 
# हम तो गुण उर्जाकी एक मशीन जैसे हैं ,जो गुण ज्यादा प्रभावी रहता है ,वैसा हमसे कर्म होता है , यह स्थिति है उनकी जो भोग में तैर रहे हैं पर योगी इन गुणोंका द्रष्टा होता है । 
# गीता -2 .28 और गीता- 14.10 को एक साथ देखिये जहाँ आपको गुण समीकरण का रहस्य मिलेगा । 
~~ ॐ ~~

Friday, October 10, 2014

गीता के मोती - 34

<> गीता : 327 + 8.17 <> 
1- गीता :3.27
 " तीन गुण कर्म करता हैं ,करता भाव अहंकार की छाया है " 
2 - गीता : 18 . 17
" कर्म होने में करता भाव का न होना , कर्मबंधन मुक्त करता है " 
<> कृष्ण जो कह रहे हैं वह कर्म - योग का फल है और हम भोग को ही परम समझनें वाले उनकी बात का भाव समझना चाहते हैं भला यह कैसे संभव हो सकता है ? होने काम्य कर्म करता का समय धन इकठ्ठा करनें और स्त्री प्रसंग में कटता है ,यह बात भागवत में शुकदेव जी परीक्षित को बता रहे हैं ।
 * कर्म एक सहज माध्यम है । 
कर्म दो प्रकार के होते हैं :--- 
* प्रबृत्ति परक कर्म निबृत्ति परक कर्म के माध्यम बन सकते हैं । गुणों के प्रभाव में जो कर्म होते हैं उहें भोग कर्म या प्रबृत्ति परक कर्म कहते हैं और ऐसे कर्म जिसके होनें में गुणों का कोई प्रभाव नहीं होता , निबृत्ति परक कर्म होते हैं। निबृत्ति परक कर्म का केंद्र भगवान होता है और प्रबृत्ति परक का केंद्र भोग होता है । 
* अहंकार भोग का मूल तत्त्व है और श्रद्धा परमात्मा के द्वार को खोलती है तथा ये दोनों तत्त्व एक साथ नहीं रहते । * अहंकार के न होने पर श्रद्धा पैदा होती है । 
~~~ ॐ ~~~

गीता के मोती - 33

<> गीता : 327 + 8.17 <> 1- गीता :3.27 " तीन गुण कर्म करता हैं ,करता भाव अहंकार की छाया है " 2 - गीता : 18 . 17 " कर्म होने में करता भाव का न होना , कर्मबंधन मुक्त करता है " <> कृष्ण जो कह रहे हैं वह कर्म - योग का फल है और हम भोग को ही परम समझनें वाले उनकी बात का भाव समझना चाहते हैं भला यह कैसे संभव हो सकता है ? होने काम्य कर्म करता का समय धन इकठ्ठा करनें और स्त्री प्रसंग में कटता है ,यह बात भागवत में शुकदेव जी परीक्षित को बता रहे हैं । * कर्म एक सहज माध्यम है । कर्म दो प्रकार के होते हैं :--- * प्रबृत्ति परक कर्म निबृत्ति परक कर्म के माध्यम बन सकते हैं । गुणों के प्रभाव में जो कर्म होते हैं उहें भोग कर्म या प्रबृत्ति परक कर्म कहते हैं और ऐसे कर्म जिसके होनें में गुणों का कोई प्रभाव नहीं होता , निबृत्ति परक कर्म होते हैं। निबृत्ति परक कर्म का केंद्र भगवान होता है और प्रबृत्ति परक का केंद्र भोग होता है । * अहंकार भोग का मूल तत्त्व है और श्रद्धा परमात्मा के द्वार को खोलती है तथा ये दोनों तत्त्व एक साथ नहीं रहते । * अहंकार के न होने पर श्रद्धा पैदा होती है । ~~~ ॐ ~~~

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