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Friday, April 24, 2009

अयोध्या -- 1

आत्मा के बाद हमारा अगला पड़ाव परमात्मा है और परमात्मा की अनुभूति तीर्थों में होती है ।
गीता के परमात्मा से मिलनें के पहले हम वह जगह तलाश रहे है जहाँ से कोई ऐसी खिड़की मिले जिसमें
झाकनें पर परमात्मा दिखे ....तो आइये चलते हैं काशी के बाद अयोध्या में ।
जो कल बौध तथा जैनिओं का तीर्थ था वह आज हिदुओं का भी तीर्थ है और जिसका नाम अयोध्या है ।
तीर्थ शब्द हमें क्या इशारा देता है ?
जब एवं जहाँ एक भ्रमण करते परम-प्रीतिमें डूबे जिज्ञासु के चलते कदम एकाएक रुक जाय , शरीर में रोमांच
उठनेंलगे , आँखे नीचेकी ओर झुक जाय , उनमें आँशू भर आए और उसे ऐसा लगनें लगे जैसे एक छोटे गोदी के
बच्चे को एक बड़े इन्तजार के बाद उसके माँकी गोदी मिल गई हो , तब वह स्थान उस जिज्ञासु का तीर्थ होता है ।
जैनिओं में एक शब्द है---तीर्थंकर...बड़ा प्यारा शब्द है , तीर्थंकर एक चलता - फिरता तीर्थ होता है ।
तीर्थंकर जहाँ होता है उसके चारों तरफ़ पाँच मील की एरिया तीर्थ बन जाता है । तीर्थंकर एक रेडियो धर्मी
पदार्थ जैसे युरेनिंयम की तरह होता है जो अपनें ऊर्जा से उस क्षेत्र को चार्ज कर के रखता है । जब कोई खोजी
उस क्षेत्र में पैर रखता है तब उसे सत्य की खुशबूं स्वयं मिलनें लगाती है ।
तीर्थ वह घाट है जिसके सामनें परम का आयाम होता है और पीठ पीछे भोग से परिपूर्ण संसार होता है ।
तीर्थ के एक तरफ़ माया और सामनें मायापति होता है । तीर्थ वह है जहाँ एक तरफ़ साकार, सविकार एवं
गुणों के तत्तों का सम्मोहन होता है और सामनें निर्विकार,निराकार, गुनातीत तथा भावातीत का आयाम होता है ।
तीर्थ वह है जहाँ से निर्विकार में छलांग भरी जाती है ।
जैन मान्यता में २४ तीर्थकर हैं जिनमें पहले तीर्थंकर हैं आदि नाथ या रिषभ देव और २४वे हैं महाबीर ।
आदि नाथ के साथ चार और तीर्थंकरों का सीधा सम्बन्ध अयोध्या से है और आदि नाथ तो सुर्यबंशी कुल में
अयोध्या में ही पैदा भी हुए थे । आदिनाथ के पुत्र थे -भारत जिनके नाम से हिन्दुस्तान का नाम भारत पडा ।
कहानी पर रुक जाना अज्ञान है और कहानी को नाव बनाकर उस पार पहुंचनें का नाम है ध्यान जो सत्य को
दिखाता है । सिंध नदी की सभ्यता की खोज में पशुपतिनाथ की मूर्ती मिली है जिसको हिंदू लोग शिव मानते है
लेकिन बैल के साथ आदि नाथ की मूर्ती का वर्णन जैन मान्यता में काफ़ी पुरानी है ।
आप से हमारी एक प्रार्थना है ----यहाँ अयोध्या को इतिहास की खिड़की से देखा जा रहा है , अगले कुछ अंकों में अयोध्या को मिस्र [egypt] की सभ्यता से भी जोड़ा जाएगा पर आप को इनमें उलझनें की जरुरत नही
है आप अयोध्या को एक तीर्थ समझें और सत्य की खोज में उसका सहारा लें । अयोध्या सत -युग से आज तक
तीर्थ है और रहेगा , अयोध्या कल एक रहस्य था , आज एक रहस्य है और कल भी रहस्य ही रहेगा--इसमें
हमें -आप को डूबना है जिससे हम वह पा सकें जिसकी खोज हम कई जन्मों से कर रहे हैं । गीता के दो सूत्रों
को आप देखिये----सूत्र ९.१९ और १३.१२ , सूत्र कहते हैं...........
परमात्मा सत है ,असत है ,जीवन है , मृत्यु है और न सत है , न असत है ----फ़िर क्या है ?
अयोध्या के घाट पर बैठ कर दाहिनें तरफ़ स्थित स्मशान को देखिये जहाँ मृत्यु में अमरत्व को देखा जा सकता है
घाट पर साधुओं को चिलम पीते भी आप देखेंगे जो लोग नशे के माध्यम से समाधि का मजा लेना चाहते है
अर्थात असत्य से सत्य की उनकी खोज बेहोशी की स्थिति में चल रही है जिस से परमात्मा तो नही मिलेगा
मौत जरुर मिलेगी ।
अयोध्या में आप को आप मिलेंगे और आप परमात्मा से परमात्मा में हैं । आप अयोध्या में भ्रमण करें जब
कोई स्थान आप को खीचनें लगे तो आप चुप चाप आँखे बंद करके वहाँ बैठ जाए , मन में उठते भावों में बहे नही
उन भावों को देखते रहें --देखते-देखते एक ऐसी घड़ी आयेगी की आप इस अयोध्या से उस अयोध्या में पहुँच
गए होंगे जो परम- अयोध्या है .......परमात्मा आप को ऐसा अवसर दे ।

=======ॐ=========

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