* कर्म - योग सूत्र *
# कर्म किये बिना कोई जीवधारी एक पल भी नहीं रह सकता ।
# हमारे सभीं कर्म मूलतः भोग होते हैं क्योंकि उनका आधार आसक्ति होती है ।
# कर्म दो प्रकारके होते हैं ; प्रबृत्ति परक और निबृत्ति परक ।
# प्रबृत्ति परक भोग से जोड़ता है और निबृत्ति परक योग कर्म होता है । # भोग कर्म में भोग - तत्त्वोंके प्रति होश उठाना कर्म योग साधना है ।
# सत्संगसे आसक्तिकी ऊर्जा रूपांतरित हो कर निर्विकार होती है ।
# आसक्ति रहित कर्म से नैष्कर्म्यकी सिद्धि मिलती है जो पराभक्ति में पहुंचाती है ।
# पराभक्ति प्रभुसे एकत्व स्थापित करती है। ##प्रभुसे एकत्व स्थापित होते ही प्रभु और भक्त दो नहीं रह पाते , जो बचा रहता है वह प्रभु होता है ।
#ऐसा भक्त लोगोंके लिए होता है पर अपनें लिए नहीं होता । परा भक्तके लिए कड़ - कड़ प्रभुके रूप में दिखता है ।
~~ॐ ~~
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Monday, April 20, 2015
गीतके मोती - 41
Wednesday, December 29, 2010
गीता अध्याय - 02
भाग - 16
गीता श्लोक - 2.47 के सन्दर्भ में गीता श्लोक - 3.5
न हि कश्चित् क्षणं अपि जातु तिष्ठति अकर्म - कृत ।
कार्यते हि अवश : कर्म सर्व : प्रकृति - जै : गुनै : ॥
गीता सूत्र - 2.47 में प्रभु कहते हैं :
कर्म करना सब का अधिकार है लेकीन -----
कर्म न करना और ....
कर्म - फल की चाह रखना अधिकार नहीं ॥
कर्म करना क्यों अधिकार है ?
इस सम्बन्ध में गीता सूत्र - 3.5 कह रहा है :
कर्म रहित होना मनुष्य के बश में नहीं क्योंकि ----
कर्म करता मनुष्य तो है नहीं , कर्म होते हैं गुणों के प्रभाव के कारण ॥
To remain without work is not the will of a being ,
one has to work because doers are the
three natural modes , infact , beings are just the witnessers .
गीता न इधर जानें देता है न उधर ,
कहता है ......
जब आ ही गए हो तो सीधे चलो ॥
सीधे चलनें का भाव है -----
इन्द्रिय - मन - बुद्धि का गुलाम बन कर न चलो ......
अहंकार के नशे में न चलो ..............
- काम - कामना , मोह - लोभ की ऊर्जा से न चलो .....
जब चल ही रहे हो तो .....
अल मस्ती में चलो जैसे सम्राट चलते हैं , न की भीखारी ॥
सम्राट के कदम दस इंच के होते हैं और भीखारी दौड़ता हुआ चलता है क्यों की ......
उनको कम समय में अधिक से अधिक घरों को कबर करना होता है ॥
==== ॐ =====
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