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Sunday, September 22, 2013

गीता मोती - 4

● गीता - 4.38 ●
न हि ज्ञानेन सदृशं
पवित्रमिह विद्यते ।
तत्स्वयं योगसन्सिद्धम्
कालेन आत्मनि विन्दति ।।
" कर्म योग सिद्धिसे ज्ञानकी प्राप्ति होती है " " Karma Yoga is the source of wisdom"
* ज्ञान और विज्ञान को समझें :
कर्म योग एक सहज माध्यम है क्योंकि कोई भी जीव एक पल भी कर्म रहित नहीं रह सकता और कोई कर्म ऐसा नहीं जो दोष रहित हो । कर्म में उठा होश कर्म बंधनों से मुक्त करता है और कर्म बंधनों की कर्ममें अनुपस्थिति उस कर्मको कर्म योग बनाती है । आसक्ति रहित कर्म ज्ञान योगकी परानिष्ठा है ( गीता 18.48-18.49 ) ।
* कर्मका अनुभव जब कर्म-करता रूप में गुणों को देखता है तब वह अनुभव वैराज्ञ में ले जता है । वैराज्ञमें सम्पूर्ण के केंद्रके रूप में ब्रह्मकी अनुभूति ही विज्ञान है और वैराज्ञ ज्ञानका फल है । ज्ञान से विज्ञान में पंहुचा जाता है ।
~~~~ ॐ ~~~~

Monday, October 4, 2010

गीता अमृत - 45

कर्म योग समीकरण - 26

गीता के पांच सूत्र --------

[क] सूत्र - 2.55 , 2.70

कामना रहित , समुद्र जैसा शांत अन्तः करण वाला
स्थिर प्रज्ञ होता है ॥

[ख] सूत्र - 18.2
कामना रहित कर्म , कर्म संन्यास है ॥

[ग] सूत्र - 4.38

सभी योगों का फल , ज्ञान है ॥

ज्ञान का अर्थ यह नहीं की शास्त्रों - वेदों का ज्ञान या
वह जिसको तर्क के
आधार पर बुद्धि , ज्ञान की संज्ञा
देती है , गीता ज्ञान उसको कहता है
जो यह बताये :
क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ क्या हैं --- गीता - 13.3
गीता जिनके मुख से निकली है , वे कहीं कोई संदेह नहीं रखना चाहते ,
आप को एक बार गीता पढनें की कला आजाये तो
गीता ही आप का गुरु है , कुछ ऐसा आप को लगनें लगेगा ॥


==== ॐ ======

Friday, September 10, 2010

गीता अमृत - 25

कर्म - योग समीकरण - 06

कर्म योग - ज्ञान योग समीकरण

यहाँ देखिये गीता के कुछ सूत्रों को जो इस प्रकार हैं ------
4.38 , 2.48 , 4.10 , 5.11 , 6.1 , 6.2 , 6.4 , 6.10 , 16.21 , 18.2
आप इन सूत्रों को बार - बार पढ़ें और इन का मनन करें ।
बार - बार चिंतन करनें से जो मिलेगा , वह होगा कर्म - योग एवं ज्ञान - योग का सम्बन्ध , जो इस प्रकार हो
सकता है ..........
भोग भाव से जो कर्म होता है वह प्रभु से दूर ले जाता है । काम , क्रोध एवं लोभ नरक के द्वार हैं और ये तीनों
तत्त्व राजस गुण के हैं । गीता कहता है [ 6.27 ] ...... राजस गुण के साथ प्रभु की ओर रुख करना कठिन है ।
आसक्ति , कामना , कर्म फल की चाह , अहंकार , संकल्प - विकल्प रहित कर्म , भोग कर्म को , योग - कर्म
बनाते हैं । योग एवं संन्यास एक साथ रहते हैं और दोनों एक हैं ; योग सिद्धि पर ज्ञान की प्राप्ति होती है और
ज्ञान प्राप्ति के साथ भोग - तत्वों की पकड़ स्वतः छूट जाती है जिसको संन्यास कहते हैं । संन्यास का यह भाव
नहीं की घर से भाग कर काशी , मथुरा में जाकर भिखारी बन जाना और सर के बालों को कटवा कर ,
मैरून कपड़ों को धारण करना , संन्यास का गीता जो भाव बता है , वह इस प्रकार है -----
वह जिसकी पीठ भोग की ओर हो और आँखें प्रभु में टिकी हो , वह है सन्यासी । गीता यह कहता है ------
योगी / सन्यासी / बैरागी / ग्यानी जो भी करते हैं वह कर्म उनको गंगोत्री बना कर रखते हैं ,
कर्म के माध्यम हैं ....... तन , मन एवं बुद्धि ॥
कर्म - योगी की यात्रा है -----
## भोग से योग की .....
## अज्ञान से ज्ञान की , ओर जो इस यात्रा में कामयाब हुआ वह .......
आवागमन से मुक्त हो गया ॥

===== ॐ ======

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