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Monday, March 1, 2010

गीता ज्ञान - 92

गीता श्लोक - 18.54 - 18.56 तक

गीता श्लोक - 18.54
सम भाव वाला परमात्मा में बसा परा भक्त होता है ।
गीता श्लोक - 18.55
परा भक्त प्रभु को तत्त्व से जान कर प्रभु में प्रवेश करता है ।
गीता श्लोक - 18.56
परा भक्त समस्त कर्मों को करता हुआ परम पद को प्राप्त करता है ।

यहाँ गीता के तीन श्लोकों में हमें परा - भक्ति , परा - भक्त , समभाव - ब्यक्ति , परम धाम , प्रभु और प्रभु में प्रवेश करनें की बातें देखनें को मिली हैं । गीता में इन शब्दों के भावों को समझनें के लिए हमें गीता के निम्न श्लोकों को भी देखना चाहिए ------
[क] श्लोक - 2.48 - 2.51 तक... जो समभाव ब्यक्ति के बारे में हैं - सम भाव ब्यक्ति वह है जो तन - मन एवं बुद्धि से गुणों द्वारा अछूता होता है ।
[ख] श्लोक - 6.29 - 6.30 , 9.29, 12.8, 13.30 ..जो कहते हैं -- आत्मा जिनका केंद्र है , जो समभाव वाले हैं , जो परम प्यार में डूबे रहते हैं , जो मन - बुद्धि से परम में होते हैं और जो सभी जीवों को परमात्मा से परमात्मा में देखते हैं , वे परा भक्त होते हैं । गीता आगे यह भी कहता है -------
[ग] श्लोक - 7.3, 7.19, 12.5 में.... परा भक्त उर्लभ होते हैं ।

अपरा और परा दो शब्द हैं जिनको बुद्धि स्तर पर समझना चाहिए । अपरा वह है जो तर्क में आता है जिसको तन मन एवं बुद्धि से जाना जाता है और किया जाता है । परा वह है जो अपरा के बाद प्रारम्भ हो कर अनंत में पहुंचता है लेकीन उसे ब्यक्त करनें वाला कोई गवाह नहीं होता ।
कबीर जी कहते हैं -- बूंद समानी समुद्र मह और फिर कहते हैं -- समुद्र समानी बूंद मह .... यह एक अच्छा उदाहरन होगा अपरा और परा को समझनें के लिए । बूंद जब समुद्र में पहुंचती है तब उसे पता चलता है की वह समुद्र में जा रही है और उस समय तक बूंद एवं समुद्र दो अलग - अलग होते हैं - दोनों में दूरी होती है ।
जब समुद्र बूंद में समाती है तब बूंद के पास इस बात को समझनें के लिए कुछ नहीं होता ,, वह तो कल्पना भी नहीं कर पाती की यह क्या हो रहा है और मात्र द्रष्टा बन कर रह जाती है - यह है परा की स्थिति इसे आप जैसे चाहें वैसे समझ सकते हैं ।
गीता अपनें प्यारे भक्तों को -----
भाव से भावातीत में ......
गुणों से गुनातीत में ......
साकार से निराकार में ....
अपरा से परा में पहुंचा कर मुस्कुराते हुए इशारा करता है की देख तेरे सामनें -------
परम धाम है ।

====ॐ=====

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