गीता श्लोक :14.5
" तीन गुण (सात्त्विक , राजस और तामन आत्मा को देह में बाध कर रखते हैं । :
Wednesday, July 29, 2015
Wednesday, June 3, 2015
गीता के मोती - 43
जन्म से जो कर्म मिला है ,
वह परिवर्तशील है
पर कर्म से जो जन्म मिला है ,
वह अपरिवर्तीय है।
Tuesday, June 2, 2015
गीता के मोती - 42
गीता : 9.7
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृनानि अहम् ।।
" कल्पके अंत में सभीं भूत मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं । अगला कल्प जब प्रारम्भ होता है तब मैं पुनः सबको रचता हूँ "
* 04 प्रकारकी प्रलय भागवत बताता है : नित्य ,आत्यंतिक, नैमित्तिक और प्राकृतिक ।
** कल्पके अंत में नैमित्तिक प्रलय होती है । यह प्रलय ब्रह्माका एक दिन अर्थात एक कल्पका समय जब गुजर जाता है तब घटित होती है।
** ब्रह्माके एक दिन में 14 मनु होते हैं । वर्तमान समय में सातवें मनु श्राद्धदेव जी चल रहे हैं ।
**ब्रह्माकी उम्र 72000 कल्पोंकी होती है और एक कल्प 1000 चतुर्युगोंका होता है जबकि एक चतुर्युग 4,320,000 वर्षका होता है ।
~~ॐ ~~
Monday, April 20, 2015
गीतके मोती - 41
* कर्म - योग सूत्र *
# कर्म किये बिना कोई जीवधारी एक पल भी नहीं रह सकता ।
# हमारे सभीं कर्म मूलतः भोग होते हैं क्योंकि उनका आधार आसक्ति होती है ।
# कर्म दो प्रकारके होते हैं ; प्रबृत्ति परक और निबृत्ति परक ।
# प्रबृत्ति परक भोग से जोड़ता है और निबृत्ति परक योग कर्म होता है । # भोग कर्म में भोग - तत्त्वोंके प्रति होश उठाना कर्म योग साधना है ।
# सत्संगसे आसक्तिकी ऊर्जा रूपांतरित हो कर निर्विकार होती है ।
# आसक्ति रहित कर्म से नैष्कर्म्यकी सिद्धि मिलती है जो पराभक्ति में पहुंचाती है ।
# पराभक्ति प्रभुसे एकत्व स्थापित करती है। ##प्रभुसे एकत्व स्थापित होते ही प्रभु और भक्त दो नहीं रह पाते , जो बचा रहता है वह प्रभु होता है ।
#ऐसा भक्त लोगोंके लिए होता है पर अपनें लिए नहीं होता । परा भक्तके लिए कड़ - कड़ प्रभुके रूप में दिखता है ।
~~ॐ ~~
Saturday, February 21, 2015
गीत के मोती -- 40
Tuesday, February 17, 2015
गीता के मोती - 39
* कान्हा )की बासुरी तो निरंतर बज रही है पर उसे सुननेंकी गहरी चाह किसको है ?
* कन्हैया ! मैं तो जो -जो लकीरें खीची , वे सारी की सारी गलत थी पर तुमनें उन्हें सही आकार देते
रहे ---
* जब सोचता हूँ कि पच्चास सालों में कितनी लकीरे खीची होगी , और कभीं यह सोच भी न उभड़ी कि आखिर यह मैं क्या कर रहा हूँ ?
* क्योंकि उस समय मेरे पास अहंकारकी कलम , मोहकी स्याही और कामनाका कागज़ जो था ।
* अब महसूस हो रहा है कि मैं क्या कर रहा था , क्या करना था और क्याकिया ?
* एक मैं था जो मैं और मेराके मद में डूबा उन लकीरों से बेहोशी में नर्क जानेंकी एक सकरी कांटो भरी गली बना रहा था और ---
* एक तूँ है कि उन टेढ़ी - मेढ़ी लकीरों से बन रही गली को स्वर्ग जानें का राज पथ बना दिया ? वाह ! , कान्हा वाह !
* हे मेरे कान्हा जी ! आपनें इतना सब कुछ मेरे लिए किया और मुझे भनक भी न लगनें दी ?
* कान्हाकी बासुरी तो निरंतर बज रही है लेकिन वह सुनाई उनको देती है जिनका मन संसारसे मुक्त और चेतनासे भर जाता है ।
* जहाँ कान्हा की बासुरी बजनी बंद हुयी , कल्प के अंत का घंटी बजनें लगेगी और नैमित्तिक प्रलय आ टपकेगी ।
~~~ ॐ ~~~
Thursday, January 1, 2015
गीता मोती - 38
Gateless gate -the Gita
* Yoga says : There are six layers of energy ; physical ,electrical , mental , emotional , intuitive and soul . Science can detect the first four . Brain - a component of mind , is a place where thaught- waves vibrate and infact brain is an electric field . Emotions are defined as energy in motion ie vibration . The wave -frequency of various emotions vary depending upon the nature of emotions . Love emotion has higher frequency than shame and guilt . Recent experiments in deep meditation show that a meditator having above 200,000 cycles/second subtle energy frequency , experiences the existence of God where as this frequency in ordinary man is about 350 cycles / second . A meditator when reaches deeper in meditation , and his subtle energy frequency crosses 200,000 cycles / second , he feels being out of his own body ,and this state is the gate of Samadhi .
~~ ॐ ~~