सूत्र : 07 - 11 सार
कैवल्यपाद सूत्र : 07
योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं अर्थात उनके कर्म न पुण्य कर्म होते हैं और न पाप कर्म होते हैं । योगियों को छोड़ शेष लोगो के कर्म शुक्ल , कृष्ण और शुक्ल - कृष्ण मिश्रित होते हैं अर्थात पुण्य , पाप और पुण्य - पाप मिश्रित कर्म होते हैं ।
(यहां सूत्र भावार्थ दिया जा रहा है लेकिन इस सूत्र की व्याख्या विस्तार से अगले लेख में देखी जा सकेगी।
कैवल्यपाद सूत्र : 08
शुक्ल , कृष्ण और शुक्ल - कृष्ण मिश्रित कर्मों के फलानुसार उनकी कर्म वासनाएं उत्पन्न होती हैं ।
कैवल्यपाद सूत्र : 09
अगला जन्म चाहे जिस योनि में हो , जिस जगह हो और जिस काल में हो पर पिछले जन्म की स्मृति और संस्कार में कोई परिवर्तन नहीं आता । चित्त में संचित कर्मो के फलों के बीज ,संस्कार निर्मित करते हैं।
कैवल्यपाद सूत्र : 10
प्राणियों में सदैव जीवित रहने की गहरी सोच के कारण , वासनाएं अनादि होती हैं ।
कैवल्यपाद सूत्र : 11
वासनाओं की निम्न 04 संग्रह भूमियाँ हैं …
हेतु , फल , आश्रय , आलंबन
1 - हेतु : वासनाओं के उठने के कारण को हेतु कहते है जो अविद्या है ; अविद्या अर्थात अज्ञान !
2 - फल : कर्म फल की सोच वासनाओं की संग्रह भूमि है।
3 - आश्रय : वासनाओं का आश्रय चित्त है ।
4 - आलंबन : वासनाओं के आलंबन तन्मात्र हैं ।
वासना क्या है ?
( कैवल्यपाद सूत्र : 8 , 10 और 11 का सीधा संबंध कर्म वासनाओं से है )
इंद्रिय -विषय संयोग से उस विषय के प्रति आसक्ति उठती है । आसक्ति से कामना का उत्पत्ति होती है । कामना पूरी होने में विघ्न आने पर क्रोध उठता है और क्रोध - सम्मोहन में मनुष्य न चाहते हुए भी पाप कर्म कर बैठता है । अतृप्त , दबी हुई कामना , वासना कहलाती है ।
~~ ॐ ~~