Friday, February 16, 2024

पतंजलि योगसूत्र में धारणा से मोक्ष तक की योग यात्रा


पतंजलि योग सूत्र दर्शन में संप्रज्ञात , असंप्रज्ञात और धर्ममेघ समाधियां एवं कैवल्य - मोक्ष  रहस्य 

किसी सात्विक आलंबन से चित्त बाध कर रखने का नियमित और निरंतर अभ्यास चित्त का उस आलंबन से जुड़े रहने का अभ्यासी बना देता है । लंबे समय तक आलंबन पर चित्त के जुड़े रहने के अभ्यास से ध्यान की सिद्धि मिलती 

है । ध्यान सिद्धि से विषय वितृष्णा का भाव गहराने लगता है ।  जब उसी आलंबन पर लंबे समय तक ध्यान स्थिर रहने लगता है तब संप्रज्ञात समाधि मिलती है ।मूलतः संप्रज्ञात  समाधि लंबे समय तक ध्यान में रहने का परिणाम है। संप्रज्ञात समाधि में आलंबन का स्वरूप सूक्ष्म हो गया होता है , केवल अर्थ मात्र प्रकाशित ( निर्भसित ) ,होता रहता है । जैस - जैसे संप्रज्ञात समाधि सघन होती जाती है और धारणा , ध्यान और संप्रज्ञात समाधि की सिद्धि एक साथ एक एक ही समय एक ही आसन में योगारूढ़ योगी को मिलने लगती है तब इसे संयम कहते हैं । इस योगाभ्यास का निरंतर अभ्यास करते रहने से संयम की सिद्धि मिलती है जिसके फलस्वरूप सिद्धियां मिलती हैं । जिस विषय पर संयम सिद्धि की जाती है , इस विषय से संबंधित सिद्धि मिलती है । पतंजलि योग दर्शन विभूति पाद में ऐसी 45 सिद्धियों की चर्चा की गई है। जैसे - जैसे साधना आगे बढ़ती जाती है ,  बुद्धि ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाती है अर्थात सत्य से भर जाती है । चित्त राजस और तामस गुणों से मुक्त हो जाता है केवल सात्त्विक गुण की वृत्तियों का संचार होता रहता है । यहां ध्यान में रखना होगा कि चित्त त्रिगुणी होता है क्योंकि यह  त्रिगुणी प्रकृति का कार्य है । अब त्रिगुणी न रह कर  केवल एक सात्त्विक गुणी रह जाता है । 

ऋतंभरा प्रज्ञा से प्राप्त विवेक ज्ञान से प्रकाशित चित्त से पिछले संस्कार धूल जाते हैं लेकिन विवेक ज्ञान से नया सत् आधारित संस्कार निर्मित हो जाता है । विवेक ज्ञान पिछले श्रुति - अनुमान आधारित ज्ञान से ( वह ज्ञान जो शास्त्र आदि एवं अध्यात्मिक आचार्यों से मिलता है ) भिन्न होता 

है । समाधिष्ठ अवस्था में  चित्त कर्म एवं कर्म वासनाओं से मुक्त हो जाता है लेकिन जैसे ही समाधि टूटती है पिछले संस्कार और कर्म वासनाएं सक्रिय हो जाती हैं , फलस्वरूप समाधि टूटते ही योगी कस्तूरी मृग जैसा हो उठता है , अपनें कस्तूरी(समाधि )  की तलाश में बेचैन हो उठता है और वह पुनः उसी समाथिष्ठ अवस्था में लौटना चाहता है ।  जब योगी संयम सिद्धि से मिली सिद्धियों से विचलित नहीं होता तब योग यात्रा आगे चल कर असंप्रज्ञात समाधि में बदल जाती है जहां धारणा - ध्यान का स्थूल आलंबन का सूक्ष्म प्रकाशित स्वरूप का भी क्षय हो जाता है । अब बिना आलंबन , बिना कारण , अपने - आप असंप्रज्ञात  समाधि घटित होने लगती है और योगी विवेक ख्याति में होता है।

असंप्रज्ञात समाधि का निरंतर योगाभ्यास करते रहने से आगे चल कर धर्ममेघ समाधि घटित होती है । यहां विवेक ज्ञान से निर्मित संस्कार का भी क्षय हो जाता है और प्राप्त विभूतियों से भी वैराग्य हो जाता है । धर्ममेघ  समाधि कैवल्य का द्वार होती है । कैवल्य में ज्ञान अनंत हो जाता है , ज्ञेय अल्प हो जाता है , पुरुषार्थ शून्य हो जाता है और योगी गुणातीत होता है। कैवल्य कैवल्यावस्था में योगी औरों के लिए होता है लेकिन अपनें लिए वह नहीं होता , ऐसा प्रकृति लय और विदेह योगी अपनें स्थूल शरीर त्याग के दृष्टा रूप में आवागमन चक्र से मुक्त हो जाता है जिसे मोक्ष कहते हैं । 

~~ ॐ ~~ 

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