Tuesday, February 12, 2013

गीता ज्ञान - 11

गीता अध्याय - 03 आधारित 

पिछले अंक में हमनें देखा कि अध्याय - 03 अर्जुन के दो प्रश्नों से सम्बंधित है ; अर्जुन अपनें पहले प्रश्न में जानना चाहते हैं ----
यदि ज्ञान , कर्म से उत्तम है तो आप मुझे कर्म में क्यों उतारना चाह रहे हैं ?
और अर्जुन दूसरे प्रश्न के माध्यम से यह जानना चाहते हैं कि -----
मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है ?

प्रश्न दो के सन्दर्भ में हम पिछले अंक में देख चुके हैं / यहाँ इस सन्दर्भ में  प्रभु कहते हैं .....
जब मनुष्य के अंदर काम - ऊर्जा का सम्मोहन सघन हो जाता है तब मनुष्य की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की सोच नहीं रह जाती और वह जो भी करता है उसे वह परम समझता है /

अर्जुन यह क्यों कह रहे हैं कि जब ज्ञान कर्म से उत्तम है तो आप मुझे कर्म में क्यों उतार रहे हैं ?

यहाँ हमें गीता श्लोक 2.49 एवं श्लोक - 2.50  को देखना होगा जो इस प्रकार है :-----

गीता श्लोक - 2.49 

दूरेण हि अवरम् कर्म बुद्धियोगात् धनञ्जय 
बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः 

गीता श्लोक - 2.50 

बुद्धियुक्ता : जहाति इह उभे सुकृतदुष्कृते 
तस्मात् योगाय युज्यस्य योगः कर्मसु कौशलम् 


  • कर्म फल की चाह  से किया गया कर्म दीन लोगों का होता है और बुद्धि से किया हुआ कर्म उत्तम होता है 
  • बुद्धि से जो कर्म करते हैं वे पुण्य - पाप से परे रहते हैं और बुद्धि - योग में हो रहे कर्म की गुणवत्ता भी उत्तम होती रहती है / 

गीता के इन दो सूत्रों के भाव अर्जुन कुछ इस प्रकार से समझते हैं -----

ज्ञान [ बुद्धि ] भौतिक कर्म से उत्तम है और ज्ञान शात्रों के मध्यम से होता है अर्थात वह जो शास्त्रों में लिखा है , उसे याद करना और लोगों को सुनाना ही ज्ञान है जिसके लिए कर्म की क्या आवश्यकता ? अर्जुन का यह अर्थ पूर्ण रूप से उनके पक्ष में है जिसके आधार पर वे युद्ध से बच सकते हैं और अर्जुन चाहते भी यही हैं कि किसी न किसी तरह कोई मार्ग प्रभु के बचनों में मिल जाए जिसके आधार पर युद्ध से बचा जा सके / 

पर प्रभु कह रहे हैं -----

युद्ध करो , युद्ध करनें की अवधि में अपनें को कर्ता से द्रष्टा बना लो जहाँ यंत्रवत तुम कर्म तो करते रहोगे लेकिन उस कर्म के होनें के पीछे कोई चाह न होगी , तुम्हारी बुद्धि समभाव में होगी और समभाव में जो कर्म होता है उसके होनें का सम्बन्ध पुण्य - पाप से परे होता है / 


  • चाह - अहँकार की ऊर्जा से जो होता है , वह भोग कर्म है ....
  • चाह - अहँकार रहित ऊर्जा से जो होता है वह योग - कर्म होता है ....
  • भोग कर्म का आधार  द्वैत्य है जैसे पुण्य - पाप , अच्छा - बुरा .....
  • भोग कर्म में भोग तत्त्वों की साधना का नाम है कर्म योग .....
  • कर्म योग का फल है ज्ञान प्राप्ति .....

ज्ञान वह है जो समभाव में रखता हो 
ज्ञान वह है जो सत्य को दिखाता हो 
ज्ञान वह है जो प्रकृति - पुरुष का द्रष्टा बनाता हो 
ज्ञान वह है जो ब्रह्मवित् की स्थिति में रखता हो 

भोग से योग ----
योग में ज्ञान ----
ज्ञान से प्रकृति - पुरुष का बोध ....
और 
ज्ञान से आत्मा के माध्यम  से परमात्मा में बसेरा बनाना 

आज इतना ही

==== ओम् =====


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