Thursday, January 24, 2013

गीता ज्ञान - 08

जीव रचना 

[ अगला चरण ]

गीता श्लोक - 14.3 , 14.4 

मम योनिः महत् ब्रह्म तस्मिन् गर्भम् दधामि अहम्  / 
संभवः सर्वभूतानां ततः भवति भारत                    //

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः           / 
तासां ब्रह्म महत् योनिः अहम् बीजप्रदः पिता        // 

भावार्थ :-----

सभी योनियों से जो जीव उत्पन्न हो रहे हैं उनके पिता स्वरुप बीज प्रदाता मैं हूँ और महत् ब्रह्म उनके गर्भ धारण करनें की योनियाँ हैं /

भगवान श्री कृष्ण कह रहे हैं : -----

जीवों के बीजों का प्रदाता मैं हूँ .....
जीवों को जो धारण करता है , वह ब्रह्म है ....

अभीं तक जीव के होनें के सिद्धांत के सम्बन्ध में गीता के निम्न सूत्रों को हम देख चुके हैं -----
7.4 - 7.6 
9.20 - 9.22
13.4 - 13.5 , 13.20 
14.3 - 14.4 
और इन श्लोकों में हमें निम्न शब्द मिले :-----

  • पञ्च महाभूत [ पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु , आकाश ]  
  • पञ्च बिषय
  • दश कार्य + तेरह करण 
  • प्रकृति - पुरुष [ दो प्रकृतियाँ ; अपरा + परा ] 
  • ब्रह्म 
  • आत्मा [ जीवात्मा ] 
  • श्री कृष्ण 

और ....

गीता में हमनें यह भी देखा , प्रकृति - उरुष दोनों अज हैं
अब आप के सामनें जीवों की रचना का तत्त्व - विज्ञान है , आप इसके सम्बन्ध में स्वयं कुछ सोचें
==== ओम् =======

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