Thursday, January 3, 2013

गीता ज्ञान - 05

चर - अचर की रचना 

गीता श्लोक - 9.10 एवं 13.20 

मया अध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्
हेतुना अनेन कौन्तेय जगत विपरिवर्तते

" मेरी अध्यक्षता में प्रकृति सभी चर - अचर की रचना करती है 
और ...
इस प्रकार जगत एक परिवर्तननीय सा दिखता है "

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतु : प्रकृतिः उच्यते 
पुरुषः सुखदु:खानाम् भोक्तृत्वे हेतु : उच्यते 

" कार्य और करण प्रकृति से उत्पन्न हैं 
और ....
प्रकृति में स्थित पुरुष सुख - दुःख भोग का कारण है 

गीता सूत्र - 9.10 में विचारणीय बात :

मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चर - अचर की रचना करती है ------
और

 गीता सूत्र - 13.20 में विचारणीय बात :

कार्य और करण क्या हैं ?
पुरुष - प्रकृति का क्या सम्बन्ध है ?

गीता सूत्र - 9.10 प्रभु स्वयं को अपनें निराकार स्वरुप की ओर इशारा  कर रहे हैं  अर्थात निराकार प्रभु चर - अचर की रचना का द्रष्टा है , कर्ता तो प्रकृति है और प्रकृति प्रभु के द्वारा बनाए गए नियमों का पूर्ण रूप से पालन करती है / प्रकृति दो प्रकार की हैं - अपरा [ पांच महाभूत , मन , बुद्धि एवं अहँकार ] और परा [ चेतना ] / अपरा और परा प्रकृतियों के माध्यम को माया कहते हैं /

गीता श्लोक - 13.20 में 10 कार्य हैं [ 05 महाभूत + 05 बिषय ] और 13 करण हैं [ 10 इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि एवं अहंकार ] /

पुरुष - प्रकृति सम्बन्ध 
पुरुष परमात्मा का वह नाम है जिसे सांख्य - योग में प्रयोग किया जाता है और जिसका अंश आत्मा है / पुरुष से पुरुष में अर्थात परमात्मा से परमात्मा में दो प्रकृतियों का प्रभु निर्मित एक माध्यम है जिसे माया कहते हैं /माया में प्रभु रहते हैं अर्थात पुरुष रहता है और माया की दो प्रकृतियाँ रचनाकार हैं जो किसी परम निर्मित नियम के अनुकूल रचना करती रहती हैं / सुख - दुःख का अनुभव जीव के मध्यम से है और जीव स्वयं परमात्मा आत्मा रूप में देह में है /
=== ओम् ======

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