Tuesday, February 4, 2014

गीता मोती - 15 (गीता अध्याय - 4 का सार )

Title :गीता अध्याय - 04 Content: गीता अध्याय - 04 श्लोकों को स्थिति : * अर्जुन : 01 ( 4.4) * कृष्ण : 40 * अध्याय में कुल श्लोक : 41 # तीसरे अध्याय में श्लोक - 3.36 के माध्यम से अर्जुन पूछते हैं : मनुष्य न चाहते हुए भी किससे प्रेरित हो कर पाप करता है ? * प्रभु इस सम्बन्ध में गीता श्लोक 3.37 से श्लोक 4.3 तक ( 12 श्लोक ) में कहते हैं :--- हे अर्जुन राजस गुणका मूल तत्त्व है काम और काम की असफलता का आभाष काम उर्जा को क्रोध में बदल देता है । क्रोध में मनुष्य अपनें मन - बुद्धि का संतुलन खो देता है और क्रोध उसे पाप करनें के लिए प्रेरित करता है । * गीता के अध्याय - 4 के प्रारम्भ को कामके सन्दर्भ में देखना चाहिए । * 4.1 > मैं इस अब्यय योग को सूर्य को बताया था , सूर्य अपनें पुत्र विवस्वान मनुको बताया और मनु अपनें पुत्र इक्ष्वाकु को बताया । *4.2 > परम्परागत यह योग राज ऋषियों को मिला लेकिन धीरे - धीरे पृथ्वी पर लुप्त हो गया । *4.3 > तू मेरा भक्त एवं सखा है इसलिए आज मैं यह पुरातन योग तुमको बताया जो एक गोपनीय बिषय है । <> कृष्ण किस योग की बात कह रहे हैं ? इस सम्बन्ध में गीता श्लोक 3.36 से श्लोक 4.3 तक को गंभीरता से देखना चाहिए ।इस योग का सीधा सम्वन्ध है , काम उर्जा का रूपांतरण ।कृष्ण गीता अध्याय - 3 के अंत में कहते है की कामका प्रभाव इन्द्रियों , मन और बुद्धि तक होता है लेकिन आत्मा पर इसका प्रभाव नहीं होता अतः आत्माकेन्द्रित ब्यक्ति काम के प्रभाव से परे रहता है । <> अर्जुनका चौथा प्रश्न <> * 4.4 > अर्जुन पूछ रहे हैं : सूर्य कल्पके प्रारम्भ से हैं और आप वर्तमान में हैं फिर मैं यह कैसे समझूँ कि आप इस योगको सूर्य से कहा होगा ? *4.5-4.6+2.12 : प्रभु कह रहे हैं : पहले मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं , तुम उनको नहीं जानता पर मैं जानता हूँ । मैं अब्यय , भूतोंका ईश्वर अपनी प्रकृति के अधीन अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ । <> पिछले जन्मोकी स्मृति में पहुँचनेका योग बुद्ध - महावीरके समय तक साधनका एक विषय होता था ; बुद्ध इसे आलय विज्ञान और महावीर जाति स्मरण कहते थे । *4.7 + 4.8 प्रभु कह रहे हैं : जब - जब धर्म की हानि अधर्म का फैलाव होता है तब तब मैं साकार रूप में स्वयं को रचता हूँ । साधू पुरुषोके उद्धार केलिए , पापियोंके विनाशके लिए , धर्म - स्थापना केलिए मैं युग - युगमें प्रकट होता रहता हूँ । * यहाँ कुछ बाते देखते हैं * + द्वापर में कृष्ण अवतार से क्या सुधार हुआ ? क्या अधर्म घटा ? यदिक ऐसा हुआ होता तो कृष्ण के स्वधाम गमनके ठीक बाद कलियुग कैसा आजाता ? यदुकुलका नाश हुआ , द्वारका समुद्र में डूबा , हस्तिना पुरको गंगा बहा ले गयी परीक्षितके बाद 6वें राजा नेमिचक्रको प्रयागजे पास यमुना तट पर स्थित कौशाम्बी जा कर बसना पड़ा क्योंकि हस्तिनापुरको गंगा बहा लेगयी थी ।यह सब घटनाएँ साधारण घटनाएँ न थी । * 4.9 > मेरे जन्म और कर्म दिब्य हैं , तत्त्वसे जो इनको समझता है वह आवागमन से मुक्त हो जाता है । *4.10 + 2.56 : राग, भय और कोध रहित ज्ञानी प्रभु में बसता है । * 4.11 : सभीं मेरे मार्गका अनुसरण करते हैं , जिसकी जैसी भक्ति उसके लिए वैसा मैं हूँ । * 4.12 : देव पूजन कामना पूर्तिका एक माध्यम है । <> यहाँ आप इन सूत्रोंको भी देखें <> गीता सूत्र 6.41-6.42,7.16,9.20-9.25, 14.14-14.15, 17.4 *4.13 : गुण - कर्म आधारित चार प्रकारकी जातियाँ हैं । * 4.14 : कर्मों से मैं सम्मोहित नहीं होता और मेरे कर्म ,कर्मफल - कामना रहित होते हैं । *4.15 : पूर्व काल में मुमुक्ष लोग , कर्मफल -कमाना रहित कर्म करते थे , तुम भी करो । *4.16: कर्म क्या है ?और अकर्म क्या है ? इसे समझना कठिन है पर मैं तुमको बताता हूँ ।वेद आधारित कर्म करना , कर्म है अन्य अकर्म । *4.17 : कर्म - अकर्म और विकर्म को समझना चाहिए । *4.18 : कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखनें वाला मनुष्यों में सझदार होता है औए ऐसा योगी समस्त कर्मो को कर सकता है । यहाँ इन सूत्रों को भी देखें : 4.10 , 4.12 , 4.18 *4.19 : संकल्प - कामना रहित कर्म से ज्ञान मिलता है और ऐसे लोग पंडित कहलाते हैं , पंडित के लिए देखो गीता सूत्र - 2.11.2.46,18.42 । * 4.20 : जो आसक्ति रहित कर्म करता है वह कर्म बंधन मुक्त रहता है । *4.21 : भोग भाव रहित कर्म ,पाप मुक्त रखता है। * 4.22 : समभाव योगी कर्म बंधन मुक्त होता है । * 4.23- 4.34 तक के सूत्र यज्ञके सम्बन्ध में हैं । *4.23 : आसक्ति - ममता रहित कर्म कर्म मुक्त होता है । *4.24 : यज्ञ में अर्पण और हवि ब्रह्म है और ब्रह्म अग्नि में आहुति क्रिया भी ब्रह्म है , ब्रह्म में लीन योगी द्वारा यदि यज्ञ हो तो फल भी ब्रह्म होगा । *4.25 : कुछ योगी यज्ञ द्वारा देव पूजन करते हैं कुछ योगी के यज्ञ का केंद्र ब्रह्ममय अग्नि होती है *4.26 : कुछ योगी अपनी इन्द्रियों को संयम अग्नि में हवन करते हैं कुछ बिषयों का हवन इन्द्रियो में करते हैं । *4.27 : कुछ योगी ज्ञान अग्नि में इन्द्रिय क्रियाओं एवं प्राण क्रियाओं का हवन करते हैं । इस सम्बन्ध में आप इन सूत्रों को भी देखें : 5.13 , 8.12-8.13,14.11। *4.28 : कुछ लोग द्रब्यका यज्ञ करते हैं कुछ तप का कुछ योग का कुछ अहिंसा ब्रत से ज्ञान यज्ञ करते हैं। > 4.29 - 4.30 ये सूत्र बुद्ध की विपत्सना ध्यानसे सम्बंधित हैं । * अपान वायुका प्राण वायु में हवन (रेचक) करें । * प्राण वायुका अपान में हवन करें । * दोनों को रोक कर (कुम्भक ) प्राणों का प्राणों में हवन करनें का अभ्यास करें । <> 10 वायु हैं , 24 घंटों में 21600 श्वास लेते हैं अर्थात 15 श्वास प्ररि मिनट । बुद्ध कहते हैं , एक घंटा प्रतिदिन श्वास - ध्यान निर्वाण का द्वार है <> *4.31 : यज्ञ में बचे हुए अमृत समान वस्तुओंका सेवन करनें वाला ब्रह्ममय होता है और यज्ञ न करने वाले को तो इस लोक में सुख नही फिर पर लोक में कैसे सुख मिल सकता है । * 4.32 : वेदों में अनेक प्रकार की यज्ञों की चर्चा है जिनको कर्म रुपेण किया जाता है और जो ऐसा समझ कर करता है , वह मोक्ष प्राप्त करता है । *4.33 : द्रब्य यज्ञ से उत्तम ज्ञान यज्ञ है और ज्ञान के साथ कर्म - त्याग घटित होता है । *4.34 : ज्ञान की प्राप्ति तुमको तत्त्वदर्शियों से हो सकती है। * 4.35 : ज्ञान से तुम मोह मुक्त हो जाएगा और ज्ञान से सभीं भूतों की स्थिति को पहले अपनें में फिर प्रभु में देख सकता है। * 4.36 : ज्ञान से पाप मुक्ति होती है । *4.37 + 4.33 : ज्ञान से कर्म संन्यास मिलता है । *4.38 : 4.41+13.2+7.19 की एक साथ देखें जो कहते हैं :--- <> योग सिद्धिसे ज्ञान मिलता है <> * 4.39 : नियोजित इन्द्रियों वाला ज्ञानी होता है और शांत ब्यक्ति होता है । * 4.40 : संदेह इस लोक और पर लोक दोनों में शांति से दूर रखता है । *4.41 : कर्म योग से जो कर्म संन्यासी हुआ होता है वह ज्ञानी संदेह रहित होता है और कर्म बंधन मुक्त होता है । * 4.42 : हे अर्जुन, तुम अपनें ह्रदय से संदेह रहित हो जाओ और कर्म योग में स्थित हो जाओ === ॐ === ok

No comments:

Post a Comment

Followers