Sunday, December 9, 2012

गीता ज्ञान -01

योग और भोग 

गीता [ श्लोक - 4.1 , 4.2 , 4.3 ] में प्रभु कहते हैं :

" मैं इस अबिनाशी योग को सूर्य को बताया था , सूर्य अपने पुत्र वैवस्वत मनु को बताया , मनु अपनें पुत्र इक्ष्वाकु  को बताया , इस प्रकार परम्परागत यह योग राज ऋषियों  तक पहुंचा लेकिन बाद में  धीरे - धीरे लुप्त होता गया / तुम मेरा भक्त एवं सखा हो अतः आज मैं इस योग को तुमको बताया है "  /
यह बात द्वापर की है और प्रभु स्वयं कह रहे हैं और योग की शिक्षा अर्जुन को दे रहे हैं पर अर्जुन प्रभु की बात पर संदेह करते हैं , उनको विश्वास नहीं हो रहा और आज की स्थिति क्या है ? इस बात पर आप सोचो /
मनुष्य मात्र एक ऐसा जीव है जो योग - भोग के मध्य एक साधरण पेंडुलम की भांति घूम रहा है / मनुष्य को जब पता चलता है कि कोई योगी उसकी बस्ती में आया है तो तुरंत भागता है , उसकी ओर लेकिन जब वह वहाँ पहुँच जाता है तब भोग उसे वापिस खीचनें लगता है , उसे उस घडी तरह - तरह की बाटें याद आनें लगती हैं और वह फ़ौरन वहाँ से भागता है अपनें भोग कर्म की ओर / 
मनुष्य का जीवन दो केन्द्रों वाला है  ; एक मजबूत केंद्र है भोग और दूसरा कमजोर केंद्र है योग / ज्यामिति में ऎसी आकृति जिसके  दो केंद्र हों उसे इलीप्स कहते हैं जो अंडाकार होता है / आप स्वयं को देखना ; जब आप  पूजा में बैठते हैं तब आप को चैन नहीं , देह के उस भाग में खुजली होनें लगती है जहाँ पहले कभीं नहीं हुयी होती , परिवार के लोगों पर ऎसी साधारण सी बातों पर आप गर्म हो उठते हैं जिन पर पहले कभीं नहीं क्रोधित हुए होते , आखीर ऐसा क्यों होता है ? 
योग का अर्थ है , प्रभु की ओर रुख करना
भोग का अर्थ है प्रभु को पीठ पीछे रखना और जो दिखे उसे बटोरना

गीता [ श्लोक - 2.69 ] में प्रभु कहते हैं :------

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी 
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने : 
" वह जो सब के लिए रात्रि सामान है , वह योगी को दिन सा दिखता है
और जो योगी को रात्रि सा दिखता है वह अन्य को दिन सा प्रतीत होता है "
भोगी और योगी की यह है परिभाषा / 
सभीं जीव भोग योनि में हैं जो मात्रा भोग के लिएबनाए गए हैं  ; भोग अर्थात काम और भोजन के लिए बनाए गए हैं लेकिन मनुष्य के सामनें जो दिखता है वह इस प्रकार है ----

  • भोग से भोग में मनुष्य का अस्तित्व है 
  • भोग में होश बना कर योग में कदम रखना उसका मार्ग  है 
  • योग में आखिरी श्वास भरते हुए परम पद की ओर चलना उसका आखिरी लक्ष्य है 
  • भोग एक माध्यम है जो योग में बदल जाता है और योग प्रभु को दिखाता है /

==== ओम् =====



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