Saturday, December 22, 2012

गीता ज्ञान - 03

गीता श्लोक 2.11 से गीता श्लोक 2.30 तक

गीता के इन 20 श्लोकों के माध्यम से प्रभु श्री कृष्ण अर्जुन को किस दिशा की ओर ले जाना चाह रहे हैं ?
अध्याय - 01 एवं अध्याय - 02 के प्रारम्भ में अर्जुन की बातों को सुननें तथा उनको देखनें से प्रभु को उस राज की मूल दिख जाती है जिसके प्रभाव में अर्जुन युद्ध न करनें की बात पकड़ रखी है और वह जड़ है - मोह का सम्मोहन /
गीता श्लोक - 1.27 से गीता श्लोक - 1.30 में अर्जुन जो बातें कह रहे हैं वे मोह के लक्षण हैं और इन बातों को सुननें के बाद प्रभु अर्जुन को मोह मुक्त कराना चाहते हैं / अर्जुन यहाँ इन श्लोकों में कहते हैं :-----
  • मेरे अंग कॉप रहे हैं
  • मेरा गला सूख रहा है
  • मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं
  • मुझे रोमांच हो रहा है
  • त्वचा में जलन हो रही है
  • मेरा मन भ्रमित हो रहा है
प्रभु अपनें गीता श्लोक - 2.11 से 2.30 के मध्य ऎसी बातों को बता रहे हैं जिनकी समझ उसे होती है जो -----
  1. स्थिर प्रज्ञ योगी होता है
  2. ज्ञानी होता है
  3. जो वैराज्ञ को पार करके गुणातीत की स्थिति में होता है
  4. जिसको समाधि का परम रस मिला हुआ होता है

अब आप सोचें , इस बिषय पर की क्या ------

एक मोह में डूबा ब्यक्ति आत्मा , परमात्मा , स्थिर प्रज्ञता , गुणातीत की स्थिति को , वैराज्ञ को , ज्ञान को , परम प्रकाश को समझ सकता है ?

प्रभु गीता श्लोक - 2.11 से 2.30 में कहते हैं ......

इंद्रिय - बिषय के संयोग की निष्पत्ति अनित्य एवं विनाशशील होती  है
सत् की कोई कमी नहीं और असत्य का अपना कोई अस्तित्व नहीं
आत्मा , अचिन्त्य , अप्रमेय , अघुलनशील , अदाह्य , अशोष्य , अविभाज्य है / आत्मा अनादि है , आत्मा सनातन है , आत्मा अति सूक्ष्म है और आत्मा परमात्मा ही है / आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकते , अग्नि इसे जला नहीं सकती , जल इसे गला नहीं सकता , वायु इसे सुखा नहीं सकती और आत्मा अचल स्थिर है / आत्मा जीर्ण देह को त्याग कर नया देह धारण करती है /
ज्ञान - योग की गंभीर बातों को सुननें के बाद अर्जुन के मन - बुद्धि में बह रही मोह प्रभावित तामस गुण की ऊर्जा की आबृति बढ़ जाती है और वे प्रश्न करना प्रारम्भ करते हैं /
प्रश्न संदेह के लक्षण हैं ,
संदेह अज्ञान की उपज है ,
 अज्ञान राजस एवं तामस गुणों की ऊर्जा से उत्पन्न होता है
 जो ज्ञान को ढक कर रखता है /

एक बात :

ज्ञान प्राप्ति के लिए कुछ करना नहीं होता .....
सभीं मनुष्य ज्ञानी रूप में पैदा होते हैं .....
संसार में ब्याप्त भोग की हवा उनके ज्ञान को ढक लेती है
अज्ञान का बोध ही ज्ञान है
ज्ञान वह ऊर्जा है जिससे परम सत्य दिखता है
==== ओम् ======

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