Wednesday, September 11, 2013

गीता मोती - 03

● गीता मोती - 03 ● 
 <> गीता - 2.69 <>
 या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
 यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने।। 
" वह जो सभीं भूतों केलिए रात्रि जैसा है उसमें संयमी लोग जागते रहते हैं और जो भूतों के लिए दिन जैसा है उसे मुनि लोग रात्रिके रूपमें देखते हैं "
 That what is night to all beings in that self controlled one keeps awake and that what is day for all beings , the self controlled one considers it as a night .
 °° भोगी और योगी की सोचमें 180° का अंतर होता है : भोगी जिसे रात्रि समझ कर उसके प्रति बेहोश रहता है ,योगी उसे परम समझ कर उसीमें होशमय बसा रहना चाहता है ।
 ** वह है क्या ? ** 
गीतामें प्रभु श्री कृष्ण अर्जुनको बता रहे हैं , भोगीके लिए मूलतः मैं रात्रि जैसा हूँ जिसके प्रति वह सो रहा है , वह मुझे मात्र कामना पूर्ति का एक माध्यम समझता है और योगीकी सोच भोगीकी सोचसे ठीक विपरीत होती है ।योगीके लिए मैं दिन हूँ जिसमें उसकी सभीं क्रियाएं होश में होती रहती हैं और वह उन क्रियाओं का द्रष्टा वना रहता है । भोगीके लिए भोग दिन जैसा होता है ; जिसके जीवन का केंद्र भोग होता है ,भगवान नहीं ,वह जो भी करता है उसके पीछे भोग प्राप्तिका लक्ष्य होता है । 
<> भोगी भोग केन्द्रित जीवन जीत है और सुख - दुःखके मध्य उसके जीवनकी नौका चलती रहती है और योगीके जीवनका आधार समभाव और समभावसे उपजा परमानन्द होता है , वह स्वयं केलिए होता ही नहीं जो कुछ भी उसकी इन्द्रियाँ समझती 
है ,देखती हैं वह सब प्रभु ही होते हैं । योगी के लिए माया निर्मित यह संसार प्रभुका फैलाव है और भोगी केलिए यह संसार उसके मन का फैलाव है ।
 ~~~ ॐ ~~~

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