Saturday, June 28, 2014

गीता मोती - 23

<> गीता - 13.30 <> 
" यदा भूत पृथग्भावम् एक स्थम् अनुपश्यति
 ततः एव च विस्तारम् ब्रह्म संपद्यते तदा " 
प्रभु कह रहे हैं :---
 " जब सब प्रभु में स्थित दिखनें लगे और सब प्रभु के विस्तार रूप में दिखनें लगे तब वह ब्यक्ति ब्रह्ममें होता है " 
 अर्थात 
 "जब कोई साधक उस स्थिति में पहुँचता है जब सम्पूर्ण प्रकृति प्रभु से प्रभु में दिखनें लगती है तब वह साधक ब्रह्मवित् हो गया होता है "
 यहाँ साधनाका एक मार्ग दिखाया गया है :--- 
" माया से मायापति की अनुभूति , मनुष्य जीवनका लक्ष्य है " । गीताके इस सूत्रको अपनें ध्यानका माध्यम बनायें ।
 ~~ हरे कृष्ण ~~

No comments:

Post a Comment

Followers