Tuesday, July 15, 2014

गीता के मोती - 25

गीता - सन्दर्भ : 11.50 + 18.74 + 18.75 #
 ** ये तीनों श्लोक संजय कह रहे हैं ** 
* गीता अध्याय - 11 में कुल 55 श्लोकों में अर्जुन के 33 श्लोकों से तीन प्रश्न उठते हैं । अर्जुन एक तरफ यह भी कहते हैं कि अब मेरा संदेह -मोह समाप्त हो चुका है और साथ में दूसरी तरफ प्रश्न भी पूछते हैं । जबतक बुद्धि संदेह -अहंकार रहित है तबतक प्रश्नका उठना संभव नहीं । प्रश्न उठते हैं संदेह - अहंकार से या दोनों के सहयोग से । 
* अर्जुन प्रभुके चतुर्भुज रूप को देखते हैं । प्रभु अपनें चतुर्भुज रूप को दिखाते हैं और अपनें चतुर्भुज रूपसे सामान्य रूपमें आकर अर्जुन को आश्वासन देते हैं । अर्जुनकहते हैं : हे अच्युत ! अब मैं आपके प्रसादरूप में अपनी खोई स्मृति वापिस पा ली है और संदेहमुक्त स्थिति में आपके बचनोंका पालन करनें को तौयार हूँ । * अर्जुनकी इन बचानो को सुन कर संजय धृतराष्ट्रको बता रहे है कि ' महात्मा ' अर्जुन के इस प्रकार रोमांचित वचनों को मैं सूना
 हूँ । 
# गीता में अर्जुनके 16 प्रश्न 86 श्लोकोंके माध्यमसे हैं और इन प्रश्नोंके सन्दर्भमें प्रभु 574 श्लोकोंको बोलते हैं । # जहाँ परम प्रभु परमानन्द श्री कृष्णका सत्संग हो ।
 # जहाँ सांख्य-योग सत्संग का माध्यम हो । 
<> उस ऊर्जा - क्षेत्रमें जो श्रोतापन को प्राप्त हो गया ,वह तो महात्मा ही होगा <>
 <> श्रोतापन अर्थात प्रभु श्री कृष्ण से एकत्व स्थापित करना । जहाँ माया ब्रह्म में समा जाती है वहाँ जो होता है वह ब्रह्म ही होता है अतः परम श्रोता बननें के बाद लोगों के लिए अर्जुन हैं लेकिन अर्जुन केलिए अर्जुन कहाँ हैं ? 
 # परा भक्तिका भक्त ,परम श्रोता , महारास का नर्तक या 
नर्तिकी ,वेद मन्त्रोंका परम पाठी अपनें लिए नहीं होते , लोगों केलिये होते हैं वे तो उस उर्जा में निराकार ब्रह्मके साकार रूप होते हैं , जो उनके इस रूप को पा लिया ,वह भी ब्रह्मवित् हो गया ।।
 ~~ हरे कृष्ण ~~

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