Tuesday, July 22, 2014

गीता के मोती - 26

<> परम पद क्या है ? 
 " अब्यक्त अक्षरः इति उक्तः तम् आहु : परमाम् गतिम् । 
यम् प्राप्य न निवर्तन्ते तत् धाम परमम् मम ।।" 
~~ गीता - 8.21 ~~ 
# जिसे अब्यक ,अक्षर ,परम गति कहते हैं ....
 # जिसकी प्राप्ति आवागमन से मुक्त करती है ... 
# उसे प्रभुका परम धाम कहते हैं , यह बात गीताका ऊपर दिया गया सूत्र कह रहा है ।ध्यान से यदि इस सूत्र में प्रवेश करें तो आप देखेंगे कि यहाँ :--- 
<> अब्यक्तको ब्यक्त करनें की कोशिश की जा रही है।
अब आगे :--- 
* Lotzu कहते हैं ," सत्य एक अनुभूति है जो ब्यक्त करनें पर असत्य हो जाता है " 
 * शांडिल्य कहते हैं , सत्य अब्यक्तातीत है पर उसकी ओर इशारा किया जा सकता है और यहाँ गीता में प्रभु कृष्ण इशारा कर रहे हैं कि हे अर्जुन ! होश में आ और देख तुम्हें ऐसा मौका फिर कब मिलनें वाला है ? 
●वह जिसकी प्राप्ति उपनिषद् नेति -नेति के माध्यम से कराते हैं -● वह जिसे कर्म योगी द्रष्टा के रूप में देखता है ---
 ● वह जिसे ध्यानी परम शून्यता के रूप में देखता है- 
●मीरा- चैतन्य जैसे परा भक्त साकारके माध्यम से निराकारमें स्वयं को खोकर देखते हैं --- 
● वेद पाठी जिसे ॐ में सुनते हैं ..
 ** वह मन बुद्धि से परे की अनुभूति का नाम है परमपद जिसमें वह पहुँचता जो फिर दुबारा जन्म नहीं लेता ,
इसे कबीर कहते हैं ----
 " बूँद समानी समुद्र में --- " 
~~ ॐ ~~

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