श्रीमद्भगवद्गीत अध्याय - 2 से कुछ ध्यानोपयोगी सूत्रों को इस अंक में देख रहे हैं ।
इन्द्रिय - बिषय संयोग भोग है और दुःख का कारण भी।
यह सूत्र अधूरा है और श्रीमद्भागवत पुराण में भी कई जगह देखा जाता है पर है , अधूरा , कैसे अधूरा है ?
बिषय - आसक्त इन्द्रिय का अपने बिषय से जब संयोग होता है तब वह भोग होता है और भोग दुःख की जननी है। गीता : 3.34 में प्रभु कहते हैं , " इन्द्रिय बिषय में राग - द्वेष की ऊर्जा होती है " और जहाँ राग - द्वेष हैं , वहाँ दुःख है । अब निम्न स्लाइड को देखते हैं 👇
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