Sunday, May 6, 2012

गीता में अर्जुन का चौथा प्रश्न

अपरं भवतः जन्म परम् जन्म विवस्वतः/

कथं एतत् विजानीयाम् त्वं आदौ प्रोक्तवान् इति//

भावार्थ

आपका जन्म अर्वाचीन है[अर्थात वर्तमान में हुआ है]और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है अर्थात कल्प के आदि में हो चुका था,मैं इस बात को की समझूं कि आप सूर्य को यह योग बताया था?

यह योग का क्या अर्थ है?

अर्जुन का तीसरा प्रश्न था , मनुष्य पाप कर्म क्यों करता है ? और प्रभु कहते हैं , काम का सम्मोहन मनुष्य को पाप कर्म करनें को मजबूर करता है और गीता अध्याय तीन के श्लोक 3.37 से 3.42 तक काम नियंत्रण से सम्बंधित हैं / प्रभु काम के सम्बन्ध में कहते हैं , हे अर्जुन ! काम के सम्मोहन से मात्र वह बचा रहता है जो आत्मा केंद्रित होता है / काम का सम्मोहन बुद्धि तक रहता है अतः इंद्रिय , मन एवं बुद्धि आधारित ब्यक्ति काम के सम्मोहन से नहीं बच सकता / बिषय , इंद्रिय , मन एवं बुद्धि की साधाना जब पकती है तब वह ब्यक्ति आत्मा केंद्रित होता है और गुणातीत स्थिति में काम का द्रष्टा बन जाता है /

गीता में अर्जुन के चौथे प्रश्न के सम्बन्ध में आप गीता सूत्र – 4.5 से 4.42 तक को देखें / प्रभु कहते हैं , हे अर्जुन ! मेरे और तेरे अबसे पहले अनेक बार जन्म हो चुके हैं [ सूत्र – 4.5 ] , मेरे सभीं जन्म मेरी स्मृति में हैं लेकिन तेरी स्मृति में तेरे जन्मों की बात नहीं है / गीता में गीता श्लोक – 4.5 में पीछले जन्मों की स्मृति की बात कही जा रही है जिसको बुद्ध आलय विज्ञान और महावीर जातिस्मरण का नाम दिए थे / ईशापूर्व पांचवीं एवं छठवीं शताब्दी तक योग के आधार पर योगी लोग अपनी पिछली स्मृतियों में वापिस लौट सकते थे लेकिन अब यह योग लुप्त हो चुका है / काम नियंत्रण योग के सम्बन्ध में प्रभु कहते हैं . यह योग अब लुट हो चुका है लेकिन मैं इसके सम्बन्ध में तुमको

बताता हूँ / गीता सूत्र – 7.11 में प्रभु कहते हैं ---- धर्माविरुद्धः भूतेषु कामः अस्मि अर्थात धर्म के अनुकूल जो काम है वह मैं हूँ / काम – वासना यह दो शब्द एक साथ देखे जाते हैं लेकिन इनकी समझमनुष्य को भोगी से योगी बनाती है / जब तक काम में वासना की ऊर्जा है तबतक वह काम राजस गुण का एक तत्त्व रहता है अर्थात यह काम भोग में खीचता हैऔरजब काम में वासना की अनुपस्थिति हो जाती है तब वह काम काम – योग बन जाता है और वह भोग की ओर नहीं राम की ओर लेजाता है /


===== ओम्=======


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