Tuesday, May 8, 2012

गीत में अर्जुन का पांचवां प्रश्न

गीता श्लोक –5.1

संन्यासं कर्मणाम् कृष्ण पुनः योगं च शंससि/

तत् श्रेयः एतयो:एकं तत् में ब्रूहि सुनिश्चितम्//

भावार्थ : ----

आर्जुन पूछ रहे हैं …....

हे कृष्ण ! आप कर्म – संन्यास की और फिर कर्म – योग की प्रशंसा करते हैं , आप कृपया मुझे उसके सम्बन्ध में बताएं जो मेरे लिए कल्याणकारी हो /

अर्जुन का पहला प्रश्न था [ गीता श्लोक – 2.54 ] कुछ इस प्रकार … ...

स्थिर प्रज्ञ योगी की पहचान क्या है ? , दूसरा प्रश्न था [ गीता श्लोक – 3.1 , 3.2 ] - यदि कर्म से उत्तम ज्ञान है तो फिर आप मुझे कर्म में क्यों उतारना चाह रहे हैं ? , तीसरा प्रश्न अर्जुन का इस प्रकार से है [ गीता श्लोक – 3.36 ] मनुष्य किससे सम्मोहित हो कर पाप कर्म करता है ? और अर्जुन का चौथा प्रश्न है , आप का जन्म वर्त्तमान में हुआ है और सूर्य का जन्म अति प्राचीन है अतः आप सूर्य को कम – योग का ज्ञान कैसे दिया ?

अर्जुन पहले स्थिर प्रज्ञ योगी की पहचान पूछते हैं जबकी उनको यह पता नहीं की स्थिर प्रज्ञता क्या

है? ,अर्जुन इसी तरह कर्म एवं ज्ञान की बात करते हैं जबकी उनको न तो कर्म की परिभाषा मालूम है और न ही ज्ञान की क्योंकि कर्म की परिभाषा अध्याय आठ में प्रभु देते हैं और ज्ञान की परिभाषा अध्याय तेरह में दी गयी है/

अर्जुन के पांचवें प्रश्न के सम्बन्ध में हमें गीता श्लोक – 5.2 से 6.32 तक को देखना चाहिए लेकिन फिर भी प्रश्न का ठीक – ठीक उत्तर यहाँ नहीं दिखता , उत्तर तो उसे मिलता है जो सम्पूर्ण गीता - सागर में तैरता है / कर्म , कर्म – योग , कर्म वैराज्ञ , ज्ञान और परम गति [ निर्वाण ] इनका आपस में गहरा सम्बन्ध है जिसको समझना ही कर्म – योग को पकड़ना है / कर्म में कर्म की पकड़ की समझ भोग कर्म को योग कर्म में बदलती है / कर्म योग में पहुंचा योगी धीरे - धीरे कर्म तत्त्वों से वैराज्ञ प्राप्त कर के ज्ञान प्राप्त करता है और ज्ञान में जिसका बसेरा होता है वहनिर्वाणप्राप्त करता है /

कर्म एक मार्ग हैजहाँ काम से राम तक की यात्रा का नाम है कर्म – योग / कर्म योग की सिद्धि का फल है ज्ञान और ज्ञान सीधे निर्वाण में पहुंचाता है तब जब उसके जीवन में अहँकार की हवा न लगे //

=====ओम्=====



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