Monday, November 22, 2021

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय - 3 हिंदी भाषान्तर

 



गीता अध्याय :: 03

अध्याय : 03 के आकर्षण ⬇

कर्म मनुष्य नहीं करता , उसके अंदर स्थित प्रकृति मूलक तीन गुण उससे कर्म करवाते हैं तथा करताका भाव अहँकारसे आता है ।  

➡ गुणों में हो रहा हर पल परिवर्तन , कर्म करने की ऊर्जा उत्पन्न करता है ।

➡ माया त्रिगुणी है और हम आत्मा - माया के योग  हैं । 

➡ हठात्  कर्म इंद्रियोंका नियोजन मूढ़ता लाता है क्योंकि मन तो बिषयोंका चिंतन करता ही रहता है अतः मनसे इंद्रिय नियोजन होना चाहिए । 

➡ राजस गुण से उत्पन्न कामका रूपांतरण ही क्रोध है जो पाप करवाता है ।


   अध्याय : 3 के ध्यानोपयोगी श्लोक ⤵️

क्र सं

श्लोक

बिषय 


4,5,19 - 20 27 - 29  ( 7 )

कर्म , गुण - कर्म विभाग


6 , 7 , 34 (3)

इन्द्रिय नियोजन +बिषय


17 , 18 (2)

आत्मा केंद्रित


37 - 43 (8)

टोटल - 20

काम


अब आगे ⬇️

अध्याय : 3 में 43 श्लोक हैं जिनमे  श्लोक 1, 2 और श्लोक 36 के माध्यमसे अर्जुन के दो प्रश्न हैं और शेष 40 श्लोक प्रभु श्री कृष्ण के  हैं।

🐧 श्लोक : 3.1- 3.2 + 36

अर्जुन पूछ रहे हैं : हे जनार्दन ! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर आप मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हैं ? 

🐧 अर्जुन आगे कहते हैं : आपके मिले हुए से वचनों से मानो मेरी बुद्धि मोहित हो रही है अतः आप मुझे केवल वह बात बताएं जो मेरे लिए कल्याणकारी हो ।

【 यहाँ गीता : 2.53 को देखना चाहिए जहाँ प्रभु कहते हैं , भाँति - भाँति के वचनोंको सुनने से तेरी विचलित हुई बुद्धि जब अचल स्थिर हो  जाएगी तब तुम योग में स्थित हो जाएगा और योगारूढ़ की बुद्धि में जो होता है वही  सत्य होता है । 【

🐧अर्जुन पूछते हैं ( श्लोक : 36 ) 

मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है ? 

इस प्रश्न का उत्तर श्लोक : 37 - 43 में आगे मिलेगा।

अब आगे ⤵

🐧  श्लोक : 3 - 35 ( 33 श्लोक )  प्रभु श्लोकों का सार ⬇

श्लोक : 3.3

⚛ सांख्य योगियों की निष्ठा ज्ञानयोग से मिलती है और अन्य योगियोंकी निष्ठा कर्मयोग आधारित होती है । यहाँ देखना होगा कि निष्ठा क्या है ?

💐 योगी के अंदर धारणा - ध्यान की जब सिद्धि मिलती है तब वह पूर्ण समर्पण भाव में डूब गया होता है ,उसे निष्ठा कहते हैं । इसे  पतंजलि ईश्वरप्रणिधान कहते हैं अर्थात ईश्वर को समर्पित हो जाना ।

साधना में समर्पण किया नहीं जाता , हो  जाता है जो साधना की उच्च भूमियों में पहुंचने में सहयोगी होता है।

श्लोक : 3.4

यहाँ प्रभु श्री निष्कर्मता के संबंध में  कह रहे है ⬇️

बिना कर्म प्रारम्भ किये कर्म निष्कर्मता नहीं मिल सकती और कर्मको त्याग देनें से भी नैष्कर्म्य सिद्धि नहीं मिल सकती ।

गीता अध्याय : 18 श्लोक - 50 में प्रभु कहते हैं ⤵️ 

नैष्कर्म्यता की सिद्धि ज्ञानयोग की परानिष्ठा है ।

श्लोक : 3.5

क्षण भर के लिए भी कर्ममुक्त होना संभव नहीं क्योंकि प्रकृति जनित गुण  कर्म करनें को बाध्य करते हैं ।

यहाँ इस संदर्भ में गीता के निम्न श्लोकों को देखें ⬇️

3.27

3.28

5.22

18.11

18.38

18.48

ऊपर के सूत्रों का सार ⤵️

◆ कर्म करता तो गुण हैं , करता भाव अहँकार की छाया है। गुण विभाग और कर्म विभाग को जाननेवाला 

तत्त्ववित् होता है ।

● भोग , इंद्रिय - बिषय संयोग का फल है जो भोग समय में सुख रूप भाषता है लेकिन उस सुख में दुःख का बीज अंकुरित हो रहा होता है ।

◆ कोई भी देह धारी पल भर के लिए भी कर्ममुक्त नहीं हो सकता । कोई ऐसा कर्म नहीं जो दोषमुक्त हो लेकिन सहज कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए ।

श्लोक : 3.6 , 3.7इन्द्रिय  निग्रह

● हठात् इन्द्रियोंको नियोजित करना मिथ्याचारी बनाता है क्योंकि इन्द्रिय - बिषय पर मन तो मनन करता ही रहता है ।

◆  जो इन्द्रिय नियोजन मन से करता हैं , वह अनासक्त कर्म इन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता हुआ श्रेष्ठ होता है ।

यहाँ देखिये गीता के निम्न श्लोकों को ⬇️

2.59

2.60

2.61

2.62

2.63

2.67

# बिषय -आसक्ति केवल परम साक्षात्कार से निवृत्त होती है । इंद्रियों को उनके बिषयों से दूर करने से केवल बिषय - निवृत्ति मिलती है , मन तो बिषयों पर मनन करता ही रहेगा ।

# बिषय आसक्त इंद्रिय बलात् मनको हर लेती है ।

# जैसे जल में चल रही नाव को वायु हर लेती है वैसे बिषय आसक्त इंद्रिय मन माध्यवम से उस पुरुष की बुद्धि को हर लेती है ।

# बश में जिसकी इन्द्रियाँ हैं वह स्थिर प्रज्ञ होता है ।

★ बिषय चिंतन से आसक्ति , आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना टूटने का भय क्रोध पैदा करता है जो विनाश में ले जाता है ।

श्लोक : 3.8

हे अर्जुन ! तुम नियत ( शास्त्र विहीत सहज कर्म ) कर्म कर क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना उत्तम है । बिना कर्म किये शरीर यात्रा भी सिद्ध नहीं होती । 

श्लोक : 3.9 - 3 .15 यज्ञ संबंधित 

श्लोक : 3.16

जो परंपरा से प्रचलित चक्र के अनुकूल नहीं जीता ,वह  इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करनेवाला पुरुष व्यर्थ ही जीता है ।

श्लोक : 3.17+3.18

● जो आत्मा केंद्रित होता है , आत्मा में तृप्त होता है  और आत्मा में ही संतुष्ट रहता है , उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं ।

आत्मा केंद्रित पुरुषका कर्म करने और कर्म न करनें में कोई प्रयोजन नहीं रहता तथा सम्पू4न् प्रसनियों से वह स्वार्थ रहित जुड़ा होता है ।

श्लोक : 3.19

आसक्ति रहित कर्म प्रभु का द्वार है ।

श्लोक : 3.20

जनक आदि ज्ञानी जन आसक्ति रहित कर्म करते रहने से परम् सिद्धिको प्राप्त हुए थे अतः तुम्हें लोकसंग्रह को देखते हुए कर्म करना चाहिए ।

श्लोक : 3.21

श्रेष्ठ पुरुषका आचरण सभी करते हैं ।

श्लोक : 3.22

हे  अर्जुन ! मुझे तीनों लोकों में कोई कर्तव्य नहीं और न  कुछ प्राप्त करने योग्य है फिर भी मैं कर्म करता हूँ ।

श्लोक : 3.23

हे पार्थ! मुझे पूर्ण सावधानी के साथ कर्म करना होता है क्योंकि मनुष्य मेरा अनुसरण करते हैं ।

श्लोक : 3.24

यदि मैं कर्म न करूँ तो समस्त लोक नष्ट हो जाएगा और मैं संहार करता कहलाऊँगा ।

श्लोक : 3.25

अज्ञानी जैसे आसक्तियुक्त कर्म करते हैं वैसे ही विद्वान लोगों को भी बिना आसक्ति लोक संग्रह हेतु कर्म करना चाहिए।

श्लोक : 3.26

प्रभु केंद्रित ज्ञानी पुरुष को शास्त्र विहीत कर्म कर रहे अज्ञानी को भ्रमित नहीं करना चाहिए । ज्ञानी को शास्त्र विहीत कर्म कर रहे अज्ञानी का साथ देना चाहिए ।

श्लोक : 3.27+3.28

इनका सार पहले दिया जा चुका है 

श्लोक : 3.29

प्रकृति जनित गुणोंके सम्मोहनके कारण अज्ञानी पुरुष गुण - कर्मों में आसक्त रहते हैं । इस प्रकार ज्ञानी पुरुषको चाहिए कि वे आसक्त अज्ञानी पुरुषको विचलित न करें ।

श्लोक : 3.30

मयी सर्वाणि कर्माणि  संन्यस्य अध्यात्मचेतसा ।

निराशिः निर्मम:  भूत्वा  युध्यस्व विगतज्वरः ।।

# अध्यात्म चिंतन से सभीं कर्मों  को मुझमें अर्पण करके  आशा रहित ममता रहित और संताप रहित हो कर युद्ध करो ।

श्लोक : 3.31

जो कोई दोष दृष्टि रहित श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं , वे सभीं कर्मों से मुक्त हो जाते हैं ।

श्लोक : 3.32

जो ऐसा नही करते और मुझे दोषारोपड़ करते हैं उस

सर्वज्ञान विमूढ़ को नष्ट हुए ही समझो ।

श्लोक : 3.33

ज्ञानी - अज्ञानी सभीं अपने - अपने प्रकृतिके अनुसार कर्म करते हैं ।

श्लोक : 3.34

# इन्द्रिय - बिषयों में राग - द्वेष छिपे रहते हैं #


श्लोक : 3.35

👌 गुण रहित भी अपना धर्म , सगुण पर धर्म से उत्तम होता है । दूसरे का धर्म भय देने वाला है और अपने धर्म में मरना भी श्रेय है ।


श्लोक : 3.36 :अर्जुन का प्रश्न : 3

हे वार्ष्णेय ! मनुष्य न चाहते हुए भी बलात् लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित हो कर पापका आचरण करता है ?

श्लोक : 3.37

प्रभु आगे कह रहे हैं …

काम एषः क्रोध एषः रजोगुणसमुद्भवः ।

महाशनो महापाप्मा विद्धि एनम् इह वैरिणम् ।।

रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है । काम भोगने से तृप्त नहीं होता । यह बड़ा पापी है । काम - सम्मोहन पाप कराता है ।

श्लोक : 3.38

💐 जैसे धुएं से अग्नि , मैल से दर्पण और जेर से गर्भ ढका जाता है वैसे काम से ज्ञान ढका रहता है ।

श्लोक : 3.39

💐 काम कभीं पूर्ण नहीं होता अर्थात कभीं तृप्तता नहीं मिलती । यह अग्नि समान है । यह ज्ञानियों का वैरी है और ज्ञान को अज्ञान स्व ढक कर रखता है ।

श्लोक : 3.40

💐 इन्द्रिय , मन और बुद्धि काम के वासना स्थान हैं ।  यह काम इन्द्रिय , मन और बुद्धि को सम्मोहित करके ज्ञान को अज्ञान से ढक कर जीवात्मा को मोहित करता है ।

श्लोक : 3.41

💐 इसलिए हे अर्जुन ! पहले तुम इन्द्रियों को वश में करो , ऐसा करने से तुम काम पर विजय प्राप्त कर सकते हो । काम ज्ञान - विज्ञान दोनों का नाश करता है ।

यहाँ ज्ञान -  विज्ञान को समझना चाहिए 

👌 05 महाभूत , 05 तन्मात्र , महत्तत्त्व , अहँकार ,  11 इंद्रियाँ , प्रकृति और पुरुष - इन 25 तत्त्वों का बोध , ज्ञान है और इन सबके होने के कारण रूप प्रभु को देखना , विज्ञान है। 

गीता : 13.2 में प्रभु कहते हैं , क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ का  बोध , ज्ञान है । भागवत : 11.19 में ज्ञान - विज्ञान को स्पष्ट किया गया है।

श्लोक : 3.42

इ💐 न्द्रियों से परे मन  है , मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे आत्मा  है …..

श्लोक : 3.43

💐 इस प्रकार आत्मा केंद्रित हो कर बुद्धि से मन को नियंत्रित करके काम को जीता जा सकता है ।

// ॐ // 

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