Saturday, April 23, 2011

गीता अध्याय –04

भाग –03


सामान्य सूत्र श्रृंखला के अंतर्गत अब यहाँ हम अगला सूत्र लेनें जा रहे हैं |

सूत्र –4.5


बहूनि मे ब्यतीतानि जन्मानि तव च अर्जुन|

तानि अहम् वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप||


परम प्रभु कह रहे हैं-----

तुम्हारे और मेरे पहले अनेक जन्म हो चुके हैं,मुझे अपनें सभीं जन्मों की स्मृति है पर

तेरे को उनकी स्मृति नहीं है|


परम प्रभु प्रारम्भ में जब कहते हैं …...

मैं काम – योग की शिक्षा सृष्टि के प्रारम्भ में सूर्य को दिया था,तब अर्जुन तुरंत पूछ बैठते हैं की

यह कैसे संभव हो सकता है,आप तो वर्तमान में हैं और सूर्य सृष्टि के साथ उत्पन्न हुए हैं?

यहाँ इस सूत्र में प्रभु अर्जुन के संदेह को दूर करते हुए कह रहे हैं …...

तूं ठीक कह रहा है,मैं और तूं उस समय भी थे और आज भी हैं और कल भी रहेंगे|

हर जन्म के बात तेरे को तेरी स्मृति बदल जाती है लेकिन मुझे सब पता रहता है की

किस युग में कहाँ और कब कौन – कौन सी घटनाएँ घटित हुई हैं|


पिछले जन्मों की घटनाओं को जानना भारतीय – योग दर्शन का एक भाग है|

बुद्ध ध्यान को आले विज्ञान कहा करते थे और महाबीर जाति स्मरण नां इस योग को दिया था|

बुद्ध और महाबीर तक यह साधना के माध्यम से जानना संभव था की हम पीछले जन्मों में क्या-क्या रहे हैं लेकिन धीरे-धीरे यह ध्यान[योग]समाप्त होता चला गया और आज कहीं किसी योगी के साथ ज़िंदा हो,कहना कुछ कठिन सा है|


======= ओम =======


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