Thursday, January 13, 2011

गीता अध्याय - 02




गीता अध्याय की इस यात्रा में हम अभी गीता सूत्र - 2.47 के सन्दर्भ
में कुछ और गीता सूत्रों को देख रहे हैं ।

आज इस कड़ी में दो - एक और सूत्रों को देखते हैं जो .....
माया , गुण और कर्म सम्बन्ध को स्पष्ट करते हैं ॥

गीता सूत्र - 7.12
प्रभु कह रहे हैं -----
तीन गुणों के भाव मुझ से हैं लेकीन मैं भावातीत और गुनातीत हूँ ॥

गीता सूत्र - 7.13
यहाँ प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं -----
गुनातीत को गुनाधीन नहीं समझ पाता ॥

गीता सूत्र - 7.14
यह सूत्र कह रहा है ------
मेरी तीन गुणों से निर्मत माया को वह समझता है जिसका केंद्र मैं हूँ ॥

गीता के तीन सूत्र इस बात को बता रहे हैं .......
तीन गुणों की माया जो प्रभु से प्रभु में है जो ब्रह्माण्ड के ब्यक्त स्वरुप को बनाती है उसे समझनें के लिए
माया से परे पहुँचना पड़ता है और माया परे पहुंचा योगी ब्रह्म समान होता है ॥
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तीन गुणों में है और मनुष्य के अंदर यही तीन गुण कर्म ऊर्जा के श्रोत हैं ।
तीन गुणों का जो समीकरण होता है वह मनुष्य से वैसा कर्म करवाता है जैसा स्वयं होता है ।
गीता - सूत्र 3.27 एवं 3.28 में हमनें पहले गुण विभाग और कर्म विभाग के सम्बन्ध में देख चुके हैं ॥
जिस दिन विज्ञान को गुण विभाग - कर्म विभाग समीकरण का पता चलेगा ......
वह दिन ......
विज्ञान का एक नया दिन होगा ॥

==== ॐ ======

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