Tuesday, May 3, 2011

गीता अध्याय –04

श्लोक –4 . 9

जन्म कर्म च मे दिब्यं एवम् यो वेत्ति तत्त्वतः/

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति स:अर्जुन//


हमारे दिव्य जन्म – कर्म को जो तत्त्व से समझ लेता है वह

आवागमन चक्र से मुक्त हो जाता है और मुझमें अपना बसेरा बना लेता है //


He who understand divine mystery of My birth and action is not born again

and he comes to Me .


प्रभु के जन्म – कर्म को तत्त्व से जानना क्या है?

तत्त्व से जानना उसे कहते हैं जिस पर कभीं कोई संदेह न हो

अर्थात

जिस जाननें में पूर्ण श्रद्धा हो,वह जानना तत्त्व से जानना है//

जिसका ज्ञान तन,मन एवम बुद्धि को तृप्त करे,वह ज्ञान तत्त्व से जानना होता है//


जिस पर मन – बुद्धि स्थिर हो रहे हों और जो परम सत्य के रूप में बुद्धि में बैठ गया हो

उसे तत्त्व से जानना कहते हैं//


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