Thursday, April 12, 2012

भक्त कभी रोता है और कभीं गाता है

लोग भक्त के जीवन को कष्ट मय देखते हैं लेकिन भक्त क्या समझता है?

समझना गुणों के सम्मोहन में उलझी बुद्धि का काम है , निर्विकार बुद्धि [ देखें गीता - 7.10 ] समझनें का कम नहीं करती वह द्रष्टा होती है : सत्य का द्रष्टा / भक्त समझता नहीं है वह सत्य में जीता है और सत्यमें मरता है , आइये देखते हैं एक दृष्टान्त … ......

रामकृष्ण परमहंसजीदक्षिणेश्वरके मंदिर में जीवन भर पुजारी रहे / एक दिन पंजाब से एक तत्त्व ज्ञानी श्रीतोतापुरीजीमहाराज रामकृष्ण जी से मिलनें लाहौर से पैदल चल कर कोलकता आये / तोतापुरी जी मंदिर परिसर में ही श्री रामकृष्णजी के साथ रुके और कुछ दिनों तक राम कृष्ण जी को देखते रहे / एक दिनतोतापुरीजी बोले , रामकृष्ण तुम कबतक इस पत्थर की पूर्ति के सामनें नाचता रहेगा ? इससे कबतक बातें करता रहेगा ? आखिर कबतक इसके आगे आंशू बहाता रहेगा ? कभीं उस पार की भी यात्रा कर और देख उस स्थान को भीजहाँ माँ स्वयं के लिए रहती है / रामकृष्ण बोले , क्या कह रहे हैं आप , वह तो यहीं रहती हैं हमारे सामनें जहाँ हैं , उस पार क्या है कुछ नहीं मात्र मंदिर की दिवार है ? तोतापुरी बोले , नहीं यह तो तेरा एक भ्रम है , माँ यहाँ नहीं रहती उनका असली स्थान उसपार है जहाँ वह नहीं ले जाती किसी को , स्वयं जाना होता है और वह मार्ग इसी पत्थर की मूर्ति से निकलता भी है / रामकृष्ण जी समझे या नहीं कहना कठिन है लेकिन उस पार की यात्रा के लिए राजी हो गए / तोतापुरीजी बोले , ठीक है तूं जैसा कर रहा है वैसा करता रह , जब ठीक समय आ जायेगा तब मैं तुझे उस पार ले चलूँगा /

एक दिन सुबह – सुबह रामकृष्ण जी आरती कर रहे थे , आरती करते हुए नाच भी रहे थे और तोतापुरी ठीक पीछे खड़े हो कर सब कुछ देख रहे थे / रामकृष्ण जी जब भावविभोर हो गए तब तोतापुरीजी उनके मस्तक के ठीक बीच में जहाँ चन्दन का टीका करते हैं वहाँ काट दिया और वहाँ से खून बहनें लगा और रामकृष्ण जी वेहोश हो कर नीचे गिर पड़े / काफी समय बाद जब उनको होश आया तब वे बोले , माँ मैं तो वहीं ठीक था , दुबारा तूं मुझे यहाँ क्यों लायी और रोने लगे ?”

भक्त भक्ति की धारा के मध्य बसा रहना चाहता है वह कभीं एक किनारे नहीं लगना चाहता / भक्ति की मध्य धारा में वह भार रहित होता है और बहता रहता है लेकिन जब वह संसार की ग्रेविटी में फस जाता है तब उसे असुविधा जरुर होती है लेकिन यह स्थिति क्षणिक होती है /

भक्त भगवन को नहीं खोजता,भगवान भक्त से अपनी निगाह कभीं नहीं उठाता

भक्त बगवान में बसा और होता है और भगवान भक्त के ह्रदय में


=====ओम्=======


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