Friday, October 30, 2009

अपरा भक्ति के माध्यम- 4

जो तन - मन से निर्विकार है उसको तपोभूमि , बुद्ध- क्षेत्र तथा ऊर्जा- क्षेत्र अपनीं ओर खीचते हैं ।
एक बार बुद्ध श्रावस्ती के जंगल से आनंद एवं अपनें अन्य भिक्षुकों के साथ गुजर रहे थे । चलते- चलते बुद्ध
एक पेड़ के पास कुछ देर रुके और उसकी ओर चल पड़े , उस पेड़ के नीचे कुछ समय ध्यान में खोये रहे और
फ़िर अपनी यात्रा पर निकल पड़े । रास्ते में आनंद मन ही मन में सोचते रहे की आखीर उस पेड़ में ऎसी कौन सी बात थी जो भंते को अपनी ओर खीच ली , यह आनंद की सोच उनको बुद्ध से पूछनें के लिए बाध्य कर दी ।
बुद्ध कहते हैं ----आनंद इस पेड़ के नीचे कभी कश्यप ऋषी ध्यान किए थे भला इस परम पवित्र भूमि को मैं
कैसे भूल सकता हूँ ?
तपोभूमि , बुद्ध-क्षेत्र तथा ऊर्जा- क्षेत्र वह स्थान हैं जहाँ समय-समय पर तपश्वी , साधक एवं बुद्ध पुरूष साधना
किए हुए होते हैं । ध्यान के समय ध्यानी के शरीर से जो परम- ऊर्जा [cosmic energy ] का विकिरण होता है वह ऊर्जा ऐसे स्थानों में समाई होती है और जब पुनः कोई उस श्रेणी का साधक वहाँ ऐ गुजरता है तब वह क्षेत्र उसे जाना- पहचाना लगता है तथा वह ब्यक्ति उस क्षेत्र की ओर खीचनें लगता है ।
तपोभूमि साधक के लिए ऐसी होती है जैसे गोदी के बच्चे के लिए उसकी माँ की गोदी होती है ।
सिद्ध - स्थान ज्ञात- अज्ञात दोनों प्रकार के होते हैं । साधना में खोया साधक जहाँ बैठ जाता है वह
स्थान ऊर्जा-क्षेत्र बन जाता है चाहे उसकी सघनता कुछ भी क्यों न हो । जानें या अनजानें में जहाँ पहुंचनें
पर तन में बहनें वाली ऊर्जा का रुख बदल जाय वह स्थान बुद्ध - क्षेत्र होता है जहाँ के अनुभव में जिया तो जा
सकता है लेकिन उस अनुभव को ब्यक्त करना अति कठिन होता है ।
बुद्ध ऊर्जा-क्षेत्रों का निर्माण करते हैं , उनके लिए जो भविष्य में बुद्ध बननें वाले होते हैं।
====ॐ=====

No comments:

Post a Comment

Followers