Tuesday, October 13, 2009

स्व की समझ ही ध्यान है

आनंद बुद्ध से पूछते हैं-----भंते! निर्वाण में आप को क्या मिला ? बुद्ध कहते हैं ---मिला वह जो पहले से था लेकिन छूट गया वह सब जिसको मैं पकड़ कर बैठा था । बुद्ध का इशारा जो समझ गया , वह ध्यान में उतर गया। रमन महर्षी कहते थे ---witnessing the source of thaughts is meditation. क्या हमें रमन महर्षि की बातसे यह समझना चाहिए कि मन-साधना का दूसरा नाम ध्यान है ? मन-साधना का प्रारंभ बिषयों से होता है , बिषयों को समझ कर इन्द्रियों को समझना होता है और जब इन्द्रियों कि समझ हो जाती है तब मन - ध्यान प्रारंभ होता है । मन दो प्रकार कि सूचनाओं को अपनें में रखता है ; वर्तमान की सूचनाएं जो हर पल बदलती रहती हैं और भूत-काल कि सूचनाएं जो कोडेड रूप में पहले से पड़ी होती हैं । बिषय-इन्द्रिय को समझनें से वर्तमान की पकडों से तो बचा जा सकता है लेकिन भूत काल की सघन पकडों से कैसे बचा जा सकता है क्योंकि मन जब वर्तमान में बिषयों से अलग हो जाता है तब भूत काल की सूचनाओं पर मनन करनें लगता है अतः रमन महर्षी की बात को ध्यान में रख कर बिचारों का पीछा करते रहनें से निर्विचार की स्थिति मिल सकती है। मन जब निर्विचार हो जाता है तब ऊर्जा ऊपर की ओर उठनें लगती है ।
समुद्र की लहरों को आप देखे होंगे , उनको देखनें से ऐसा नही दिखता की समुद्र में कोई स्थिर स्थान भी होगा।
समुद्र की लहरों को पकड़ कर यदि नीचे की यात्रा की जाए तो वह तह मिल जायेगी जो स्थिर होती है और जिससे लहरें ऊपर उठती हैं । मन भी कुछ इस तरह ही है , मन की तरंगें जहाँ से उठती हैं वह तरंग रहित होता है तथा निर्विचार होता है । मन साधना में उस स्थान को पकड़ना पड़ता है । जैसे पूनम के चाँद के प्रतिबिम्ब को शांत झील में देख कर उसके बिपरीत दिशा में चलनें से मूल चाँद मील सकता है वैसे शांत चित पर प्रभु का प्रतिबिम्ब देख कर परा - ध्यान में पहुँच कर समाधि में प्रवेश किया जा सकता है ।
विचारों का सम्बन्ध औरों से होता है और औरों पर अपनीं ऊर्जा को लगानें से अपनें को क्या मिलनें वाला है ।
अपनीं ऊर्जा को मैं कौन हूँ की सोच पर लगानें से ध्यान में प्रवेश मिलता है । परिधि से केन्द्र की यात्रा का नाम ध्यान है ; परीधि है भोग से परिपूर्ण यह संसार और केन्द्र है परमात्मा ।
====ॐ======

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