Wednesday, February 22, 2012

आमा चिंतन का बिषय नहीं

गीता श्लोक –2.29

प्रभु श्री कृष्ण कह रहे हैं ------

हे अर्जुन!कोई आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता है,कोई आश्चर्य पूर्वक इसको तत्त्व से वर्णन करता है कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई सुन कर भी इसे नहीं समझता//

Some one looks it as morvel , some one explains it as morvel , some one hears it as morvel and some one does not understand it even after listening .

गीता श्लोक –2.30

देहि नित्यं अबध:अयं देहे सर्वस्य भारत

तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि

देह में सदैव देही [ आत्मा ] अबध्य है अतः मृत्यु में रख रहे कदम वाले प्राणियों के लिए तुमको शोक नहीं करना चाहिए /

The dweller in body can never be slain and so you should not grieve for those who are stepping into death .


आत्मा के सम्बन्ध में प्रभु श्री कृष्ण के दो सूत्रों को हमनें देखा जो कह रहे हैं--------

आत्मा आश्चर्यमय है उनके लिए जो इसका वर्णन करते हैं , जो इसके वर्णन को सुनते हैं और कुछ लोग तो सुन कर भी इसे नहीं समझ पाते / कुछ लोग नहीं समझ पाते , ऎसी बात नहीं हैं अपितु आत्मा को समझनें वाले दुर्लभ योगी होते हैं जो कई सदियों के गुजरनें के बाद प्रकट होते हैं / गीता ह्लोक – 2.25 में प्रभु कहते हैं - आत्मा अचिंत्य एवं अब्यक्त है और यहाँ कह रहे हैं की कोई इसे आश्चर्य से सुनता है और कोई सुन कर भी इसे नहीं समझता / वह जो अब्यक्त एवं अचिंत्य हो उसे कोई कैसे ब्यक्त कर एकता है और कोई उसे कैसे समझ सकता है ?

आत्मा ब्यक्त होनें वाली सूचना नहीं , आत्मा चिंतन का बिषय नहीं , आत्मा तो एक आयाम है जो साधना के आखिरी सोपान से गुजरानें के बाद मिलता है और जहां साधक प्रभु की अनुभूति को समाधि के माध्यम से पाता है /


====== ओम् =======


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