Wednesday, March 9, 2011

अध्याय - 03

 

अध्याय तीन में हमनें तीन सूत्रों को देखा - सूत्र 3.6 , 3.7 , 3.34 //

ये  सूत्र कर्म- योग के अहम सूत्र हैं ; इनके माध्यम से प्रभु कहते हैं ----

इन्द्रियों को हठात नियोजित नहीं करना चाहिए ….

इन्द्रियों से मैत्री बना कर उनको बश में रखना चाहिए ----

सभी बिषयों में राग - द्वेष होते हैं जो -----

इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं //

 

अब इन तीन सूत्रों के साथ इनको भी देखते हैं -----

 

सूत्र – 2.64 – 2.65

नियोजित इन्द्रियों वाला प्रभु प्रसाद रूप में स्थिर प्रज्ञता पाता है और ----

परम आनंद में रहता है //

 

सूत्र 4.10 , 2.56

यहाँ प्रभु कहते हैं ----

राग भय क्रोध रहित ब्यक्ति ज्ञानी - मुनि होता है //

आज इतना ही

==== ओम ======

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