Thursday, November 26, 2009

गीता-ज्ञान .....7

कामना रहित आत्मा से आत्मा में संतुष्ट , स्थिर - प्रज्ञ होता है ......गीता 2.55
अर्जुन का पहला प्रश्न गीता श्लोक 2.54 के माध्यम से स्थिर - प्रज्ञ से सम्बंधित है और ऊपर जिस बात को
परम श्री कृष्ण कह रहे हैं वह अगला श्लोक है ।
अब आप श्री कृष्ण की बात को देखनें के बाद इस बात पर सोचें की -------
[क] आत्मा से आत्मा में संतुष्ट रहना क्या है ?
[ख] क्या आत्मा ज्ञेय माध्यम है ?
[ग] क्या आत्मा को मन-बुद्धि स्तर पर जाना जा सकता है ?
जब इन प्रश्नों से संतुष्टि मिलेगी तब वह आयाम मिलेगा जिसमें ...........
पीठ तो होगी भोग संसार की ओर और नेत्र होंगे परम प्रकाश में तथा वह ब्यक्ति होगा-------
आत्मा से आत्मा में संतुष्ट ।
गीता कहता है ---योग सिद्धि पर ज्ञान के माध्यम से आत्मा का बोध ह्रदय में होता है और आत्मा अब्यक्त
एवं अचिन्त्य है [गीता श्लोक ...4.38, 13.24, 2.25] फ़िर परम श्री कृष्ण मोह में उलझे अर्जुन को क्यों
और कैसे सबसे पहले आत्मा को ब्यक्त करना चाहा है ?
आत्मा के लिए गीता के निम्न 23 श्लोकों को देखना चाहिए -------
2.18- 2.30, 10.20, 13.17, 13.32- 13.33, 15.7, 15.8, 15.11, 15.15, 14.5, 18.61
गीता ऊपर के श्लोकों के माध्यम से आत्मा की एक तस्बीर बनाता है जिसको बुद्धि स्तर पर समझना
आसान हो सके , आइये ! देखते हैं इस तस्बीर को --------
आत्मा विकार सहित देह में निर्विकार रूप में ह्रदय में है जो कुछ करता नहीं लेकिन इसके बिना कुछ
होना सम्भव भी नहीं । आत्मा देह में एक द्रष्टा है । आत्मा ह्रदय में परमात्मा है जो शरीर के कण-कण में है।
आत्मा आदि- अंत रहित है और स्थिर है । आत्मा किसी भी रासायनिक, भौतिक या जैविक बिधि से
न तो रूपांतरित किया जा सकता है और न ही बिभक्त किया जा सकता है । आत्मा देह समाप्ति पर मन के साथ गमन करता है । मन जब निर्विकार होता है तब आत्मा का फ्यूजन परमात्मा में हो जाता है और यदि मन
विकारों के साथ होता है तब वह आत्मा नया शरीर धारण करता है ।
स्थिर- प्रज्ञ यह नहीं समझता की वह आत्मा केंद्रित है क्योंकि उसके जाननें के माध्यम --मन-बुद्धि गुन रहित होते हैं । स्थिर प्रज्ञ द्रष्टा होता है [गीता श्लोक 14.19, 14.23 ] और वह संसार को भावातीत की स्थिति में देखता है ।
जब तन, मन एवं बुद्धि निर्विकार होते हैं तब वह ब्यक्ति परा साधना में पहुंचा होता है जहाँ से ज्ञान मिलता है [गीता श्लोक 18.50] और ह्रदय का द्वार खुलता है तथा वह साधक परम प्रकाश की किरणों को देख कर
धन्य हो उठता है ।
परम प्रकाश क्या है और उसको कौन देखता है ? एवं उसे कब प्राप्त करता है ? - -यह रहस्य एक ऐसा रहस्य है जिस पर ध्यान का
अस्तित्व टिका हुआ है ।
विकार से निर्विकार .....
बिषय से बैराग्य ..........
गुणों से गुनातीत ........
भावों से भावातीत ----
की यात्रा का नाम
गीता है ।
====ॐ========

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