Wednesday, May 13, 2009

क्या यही सत्य है ?

जब हम मंदिर में होते हैं तब ऐसा क्यो दिखतेहै जैसे जेल में हैं ?
मन्दिर जाते समय हम एक अपराधी जैसा स्वयं को क्यों दिखाते हैं ?
घर में जब कभी कोई धार्मिक कार्य होता है तब हम जल्दी में क्यों होते हैं ?
जब हम पूजा में बैठे होते हैं तब शरीर के उस भाग में भी खुजली होनें लगाती हैं जहाँ कोई उम्मीद नही होती ---ऐसा क्यों होता है ?
जब पूजा-कार्य समाप्त हो जाता हैं तब हमें सकूंन क्यों मिलता है ?
मन्दिर में पत्थर की मूरत न देखती है , न सुनती है और न ही बोलती है फ़िर भी हम उसके सामनें
ऐसे होते हैं जैसे थानेदार के सामनें खड़े हो --ऐसा क्यों ?
कहीं ऐसा तो नही की हम भय से मुक्त होनें के लिए परमात्मा को खोजते हैं ?
परमात्मा को हम कामना पूर्ति - करता के रूप में क्यों देखते हैं ?
कामना करते समय क्या कभी हम यह सोचते हैं की यह हमारी कामना किस प्रकार की है --क्या ऐसी
कामना परमात्मा के सामनें रखनें लायक भी है ?
हम ऐसा क्यों सोचते हैं --पड़ोसी का बेटा या बेटी फेल हो और मेरा बेटा या बेटी पास हो ?
हम ऐसा क्यों सोचते हैं की जो हमें मिले वह किसी और को न मीले ?
इस प्रकार के अनेक प्रश्न हैं जिन पर हम सब को सोचना चाहिए , क्या आज से हम इस सोच पर चलेंगे ?
यदि ऐसा हुआ तो हममें एक क्रांति की लहर दौड़नें लगेगी और तब हमें परमात्मा को खोजना
नही पडेगा ।
=====ॐ======

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