Saturday, August 14, 2010

गीता अमृत - 07

परम यात्रा

आइये आज हम चलते हैं गीता माध्यम से एक परम पवित्र यात्रा पर जिसको हम सभी जानते तो हैं पर इस
यात्रा पर चलते विरले ही हैं ।
पहले गीता के सूत्रों को देखें जो इस यात्रा का निर्माण करते हैं --------
** सूत्र - 9.19 प्रभु कहते हैं ..... वर्षा का कारण , मैं हूँ ।
** सूत्र - 10.24 प्रभु कहते हैं .... सागर मैं हूँ ।
** सूत्र - 10.25 प्रभु कहते हैं ... हिमालय मैं हूँ ।
** सूत्र - 10.23 प्रभु कहते हैं ... शिव मैं हूँ ।
** सूत्र - 10.35 प्रभु कहते हैं ... गायत्री मैं हूँ ।
** सूत्र - 10.25 प्रभु कहते हैं ... यज्ञों में पवित्र नाम जप मैं हूँ ।
** सूत्र - 10.21 प्रभु कहते हैं ... सूर्य मैं हूँ ।
** सूत्र - 15.12 प्रभु कहते हैं ... सूर्य का तेज मैं हूँ ।

अब आप इस गीता की परम पवित्र यात्रा पर निकल सकते हैं ; यात्रा गायत्री के जप के साथ गंगा सागर से आकाश के
माध्यम से वाष्प के रूप में शिव की जटाओं से गंगोत्री से गंगा के रूप में सागर तक की और पुनः गंगा सागर में
बिलीन होनें पर गंगा को सागर बन जानें का अवसर मिलता है है और वाष्प बननें के बाद ही पुनः इसको हिमालय से यात्रा करनें का मौक़ा बार - बार मिलता है ।
मेरे पास सिमित शब्द हैं , जो कहना चाहता हूँ कह नहीं पा रहा लेकीन आप ऊपर दिए गए सूत्रों में अपनें को जितना
दुबोयेंगे , आप की यह परम यात्रा उतनी ही आनंद से परिपूर्ण होगी ।

परम श्री कृष्ण की ऊर्जा से यह ब्रह्माण्ड है , आप को इस ऊर्जा के लिए कहीं जाना नहीं है , बश कभी - कभी
अपनें अन्दर झांका करें ।

===== ॐ =====

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