Tuesday, August 31, 2010

गीता अमृत - 15


गीता सूत्र - 5.11

प्रभु अर्जुन से कहते हैं .......

.. योगी आसक्ति रहित तन , मन एवं बुद्धि से जो कुछ करता है वह उसको और निर्मल
करता है ॥

प्रभु की बात मात्र वह समझता है जिसके ----

## तन , मन एवं बुद्धि में प्रभु ऊर्जा के अलावा और कुछ न हो ।
## जिसके तन ,मन एवं बुद्धि में निर्विकार ऊर्जा का प्रवाह हो रहा हो ।
## जो इस संसार को प्रभु के फैलाव रूप में देखता हो ।
## जो सब को प्रभु में और प्रभु को सब में देखता हो ।
## जो सुख - दुःख एवं हानि - लाभ में सम भाव रहता हो , और ....
## जिसका अहंकार पिघल कर श्रद्धा में बदल चुका हो ।

प्रभु की बात को मोह में डूबा अर्जुन क्या समझेगा ? उसे तो युद्ध क्षेत्र से पलायन करना ही
दिख रहा है ।

प्रभु सूत्र में कहते हैं -----

योगी का कर्म उसे गंगोत्री बनाता है । अब हमें - आप को देखना चाहिए की .......
हम सब का कर्म हम सब को क्या बना रहा है ?

===== ओम =======

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