Saturday, March 28, 2009

स्मृति-रहस्य

स्मृति का सम्बन्ध मन से है। इन्द्रियो का अनुभव मन में संग्रहितहोता रहता है। मन समय-समय पर उन अनुभवों के ऊपर मनन करता रहता है। मन के मनन में बुद्धि उसको मदत करती है। मनन से दो प्रकार की बातें निकलती हैं--पहली बात ...मनुष्य मनन के आधार पर कर्म करता है और दूसरी बात है....मनन में आदमी खोता चला जाता है। कर्म के आधार पर कर्म-फल मिलता है जिससे सुख-दुःख का अनुभव होता है। मनन में खोना एक गंभीर बात है। जैसे-जैसे मनन गहराता है मन विचारों से विचार-शुन्यता की ओर जानें लगता है। विचार-शुन्यता का अनुभव ही ध्यान कहलाता है । ध्यान की गहराईमें जो मिलत है-उसको परमात्मा- मय अनुभूति कहते हैं। जब विचारों के प्रति होश रहता है तब विचार-शुन्यता आती है और जब होश नहीं होता तब विचार मन के अंदर गहराई में पहुंचनें लगते हैं --जैसे-जैसे विचार गहराईमें पहुंचते हैं , और सघन होजाते हैं। मन के केन्द्र पर पंहुचा विचार आत्मा के नजदीक हो जाता है। अब आप गीता के निम्न श्लोकों पर नजर डालें-----------------------
श्लोक-8.6 अंत काल तक की सघन स्मृति मनुष्य के अगले जन्म को निर्धारित करती है।
श्लोक-15.8 आत्मा के साथ मन तथा इन्द्रियां भी होती हैं।
श्लोक-10.22 इन्द्रीओं में मन,परमात्मा है।
श्लोक-4.4 अर्जुन का चौथा प्रश्न है-----सूर्य का जन्म सृस्ती के प्रारम्भ में हुआ था और आप वर्तमान में हैं फ़िर आप उन्हें काम-योग के सम्बन्ध में कैसे बताये?
श्लोक-4.5 कृष्ण कहते हैं---तेरे-मेरे पहले बहुतसे जन्म होचुके हैं जिनकी स्मृति तुमको नहीं है पर उनकी स्मृति मुझे है ।
श्लोक-14।14,14.15
मृत्यु के समय यदि सात्विक विचार सघन होते हैं तब स्वर्ग मिलाता है लिकिन स्वर्ग में रहनें के
बाद पुनः जन्म लेना पड़ता है। यदि मृत्यु के समय भोग विचार सघन हों तब भोग के लिए नया
जन्म मिलता है तथा यदि तामस विचार से मनुष्य भावित है तब पशु एवं अन्य योनी मिलती है।
गुनातीत योगी आवा-गमन से मुक्त हो जाता है।
पिछले जन्मों की स्मृति में पहुँचने के विज्ञानं को बुद्ध आलय - विज्ञानं की संज्ञा देते हैं और महावीर इस विज्ञानं को जाती स्मरण कहते हैं।

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