Sunday, January 10, 2010

गीता ज्ञान - 47

अध्यात्म क्या है ?-----गीता....8.1

अर्जुन पूछ रहे हैं , श्री कृष्ण से , अपनें आठवें प्रश्न के माध्यम से ।
श्री कृष्ण कहते हैं ----मनुष्य का स्वभाव - अध्यात्म है .....गीता- 8.3
अब हमें श्री कृष्ण की बात को समझना चाहिए .............
गीता श्लोक 18.59 , श्री कृष्ण कह रहे हैं -------
तूं अहंकार के कारन युद्ध नहीं करना चाहता लेकीन तेरा स्वभाव तुझे युद्ध के लिए विवश कर देगा , और --
गीता श्लोक 18.60 में कहते हैं ........
तूं मोह के कारन युद्ध से बचना चाहते हो लेकीन अंततः स्वभाव के कारन तेरे को उद्ध करना ही पडेगा ।
यहाँ गीता से जो बात मिलाती है वह है ------
[क] मोह में अहंकार होता है ।
[ख] स्वभाव से कर्म होता है , यदि ऐसी बात है तो अब देखिये गीता सूत्र ----2.45 , 3.27 , 3.33 को जो कहते हैं ----
मनुष्य गुणों के सम्मोहन में आ कर भोग कर्म करता है । इन्द्रियों एवं बिषयों के सहयोग से जो कर्म होते हैं , वे गुण आधारित कर्म होते हैं और ऐसे कर्म , भोग कर्म होते हैं ।
गीता सूत्र 14.10 कहता है ------
मनुष्य में तीन गुणों का हर पल बदलता एक समीकरण होता है । यहाँ बुद्धि के आधार पर आप सोचें ----
जब गुण समीकरण हर पल बदलता रहता है , जिस से स्वभाव बनता है और स्वभाव से कर्म होता है फिर
स्वभाव , अध्यात्म कैसे हो सकता है ?
गीता सूत्र 2.49 में जहां श्री कृष्ण समत्व-योग एवं बुद्धि- योग की बातें बता रहे हैं , कहते हैं ----
तूं भोग कर्मों में अपनें बुद्धि को स्थिर करनें के उपायों को खोजो अर्थात ------
भोग भावों से बचना तो मुश्किल है लेकीन अभ्यास से धीरे- धीरे उन कर्मों में भोग- तत्वों के प्रति होश बनाया जा सकता है और इसी का नाम - कर्म- योग है ।

भोग को योग का द्वार बनाओ
भोग को योग का मार्ग समझो
अहंकार को श्रद्धा में ढालो
जब ऐसा करनें में सफल हो जाओगे तब ----
तुम अपनें मूल स्वभाव - अध्यात्म को देख सकते हो ।
गुण आधारित स्वभाव तो मूल स्वभाव का छिलका सा है ।

====ॐ=================

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