Thursday, October 21, 2010

गीता सुगंध - 07


ज्ञान योग समीकरण - 07

गीता के तीन श्लोक :
[क] श्लोक - 4.38
प्रभु कह रहे हैं ......
ध्यान , योग , भक्ति , तप - सब का एक फल है , ज्ञान ॥
[ख] श्लोक - 5.17
यहाँ प्रभु कह रहे हैं ......
श्रद्धावान , तन , मन , बुद्धि से प्रभु - केन्द्रित , ग्यानी होता है ॥
[ग] श्लोक - 13.11 - 13.12
सम भाव योगी परा भक्त होता है ॥
यहाँ ऎसी कौन सी बात है जो स्पष्ट नहीं दिखती ,
क्या जरुरी है प्रभु की बातों में हम अपनी झूठी बातों
को पिरोयें ?
हम भोग में हों या योग में - दोनों का प्रारम्भ मन से है । इन्द्रियाँ मन के फैलाव रूप में हैं । हम जो कुछ
भी समझते हैं उनका आधार मन होता है जो बुद्धि से हर क्षण जूडा होता है । मन - बुद्धि मिल कर एक तंत्र
की रचना करते हैं जो एक तरफ निर्विकार से ऊर्जा लेता है और दूसरी ओर विकारों से परिपूर्ण संसार में
इन्द्रियों के माध्यम से भ्रमण करता रहता है ।

अपरा को ही साकार कहते हैं और निर्विकार , निराकार को परा कहते हैं ।
साकार के माध्यम से जब मन - बुद्धि
स्थिर हो जाते हैं , जब मन - बुद्धि करता नहीं द्रष्टा बन जाते हैं तब यह स्थिति होती है - परा की ॥
इस स्थिति को इन्द्रियों के माध्यम से ब्यक्त करना असंभव होता है ।
ज्ञान वह है जो अब्याक्तातीत हो , जो इन्द्रियों के माध्यम से न पकड़ा जा सके ,
जो मन - बुद्धि से न ब्यक्त
किया जा सके , जिसकी अनुभूति इतनी गहरी हो की जिसको छोड़ा भी न जा सके ।
सत्य को पकडती है - चेतना , जिसका सीधा सम्बन्ध है - जीवात्मा से ।
ध्यान के माध्यम से जब इन्द्रियाँ , मन , बुद्धि पूर्ण रूप से निर्विकार ऊर्जा से भर जाते हैं तब ये मात्र
द्रष्टा होते हैं और देह के पोर - पोर में चेतना का फैलाव हुआ होता है और ....
वह ब्यक्ति सम्पूर्ण जगत को एक के फैलाव रूप में देखता है ।
लोग कहते हैं -----
किसनें देखा है प्रभु को ?
किसनें देखा है - आत्मा को ?
बात उनकी भी अपनी जगह पूर्ण है लेकीन क्या जो हम देखते हैं वह सब के सब सत होते हैं ?
क्या इन्द्रियाँ मुझे धोखा नहीं देती ?
क्या मन हमें गुमराह नहीं करता ?
हम क्यों अपनी बीबी से , अपने बच्चे से कभी प्यार करते हैं तो कभी नफरत ?
भाई ! कुछ तो है जो मन - बुद्धि से परे है , और ......
गीता उसे कहता है ......
ब्रह्म
जो प्रभु के अधीन है
जो जीवों का बीज है

=== ॐ ========

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