Thursday, October 7, 2010

गीता अमृत - 48

कर्म योग समीकरण - 29

गीता के तीन श्लोक ......
श्लोक - 3.4 , 18.49 , 18.50 , कहते हैं ------

** कर्म त्याग से नैष्कर्म - सिद्धि नही मिलती ......
** नैष्कर्म - सिद्धि जो ज्ञान - योग की परा निष्ठा है ......
** नैष्कर्म - सिद्धि मिलती है ------
** आसक्ति रहित कर्म से ॥

खोजो इसमें भक्ति को , क्या कोई इसमें कुछ और पा सकता है ,
इसके अलावा .....
की बुद्धि में तर्क - वितर्क की आखिरी सीमा जब इन तीन सूत्रों पर सोच - सोच कर ,
आजाये , तब .....
कर्म स्वतः आसक्ति रहित होनें लगेंगे ,
क्यों ?
क्योंकि ......
जब मन - बुद्धि की सीमा समाप्त होती है तब वहाँ से प्रभु की खुशबू आने लगती है ।
मन बुद्धहि की सीमा का अंत होना का यह अर्थ नहीं हैं की मन - बुद्धि का अंत हो जाना ,
मन - बुद्धि - सीमा का
अंत आनें का अर्थ है ......
मन - बुद्धि में बहनें वाली ऊर्जा के रुख का बदलना
अर्थात .....
मन - बुद्धि का गुणों के सम्मोहन से मुक्त हो जाना ॥

आप उठाइये गीता प्रेस गोरखपुर का गीता और ......
ऊपर दिए गये सूत्रों को बार - बार पढ़ कर उन पर मनन करना प्रारंभ कर दें , ऐसा करनें से -------
आप भी वही कहेंगे जो मैं कह रहा हूँ ॥
गीता से अमृत की बूँदें टपकती हैं , लेकीन .......
लेनें वाले भ्रमित हैं ॥

===== ॐ ======

No comments:

Post a Comment

Followers