Monday, October 25, 2010

गीता सुगंध - 11

राग द्वेष एवं स्थिर प्रज्ञता

यहाँ गीता के तीन श्लोकों को एक साथ देखते हैं --------
श्लोक - 2.56 , 2.64 , 2.65
आइये देखते हैं इनमें कौन सा रस है ?
प्रभु , अर्जुन से कह रहे हैं :--
राग द्वेष रहित योगी प्रभु प्रसाद रूप में स्थिर प्रज्ञता हासिल करता है ॥
तीन श्लोक , इनके छः पंक्तियाँ और एक पंक्ति का रस , ऐसा रस जो अब्यक्तातीत सा दिखता है ॥

क्या है राग और क्या है , द्वेष ?
गीता श्लोक - 3.34 में प्रभु कहते हैं :----
सभी बिषयों में राग - द्वेष होते हैं ॥
बिषय अपनें ज्ञान - इन्द्रिय को राग के माध्यम से आकर्षित करते हैं अर्थात .......
राग के प्रभाव में हम बिषय की ओर चलते हैं और जैसे - जैसे बिषय नजदीक आता जाता है ,
मन - बुद्धि में बहनें
वाली ऊर्जा की लहर तेज होती जाती है ।
राग में समयातीत की स्थिति मिल सकती है
अगर राग भोग का
माध्यम न बन कर ,
ज्ञान का माध्यम बन जाए ॥
द्वेष क्या है ?
द्वेष न तो क्रोध है न ही राग है ; द्वेष में भ्रम की स्थिति होती है , कभी मन कहता है - मिलेगा
और कभी कहता है ,
ऐसा संभव नहीं दिखता । द्वेष में बिषय से हम दूर भी नही होना चाहते और
सिकुड़े - सिकुड़े से नजदीक
जानें के भाव में उसके चारों तरफ घूमते रहते हैं ।
द्वेष एक तरह से इंतजार की स्थिति है जहां संदेह न आगे और न ही पीछे जानें देता है ॥
बिषयों में राग - द्वेष भरे होते हैं या यों कहें की -----
बिषयों से राग - द्वेष के रस टपकते रहते हैं जो इन्द्रियों को सम्मोहित करते हैं , ज्यादा उचित होगा ॥
गीता में प्रभु इस बात को अर्जुन से कह रहे हैं और -------
अर्जुन तामस गुण में डूबा हुआ है , यहाँ से यदि निकला भी तो राजस में जा फसेगा अर्थात .......
अर्जुन के लिए राम - बाग़ अभी दूर है ।
गुणों के सम्मोहन में फसे ब्यक्ति के लिए यह कहना की -----
सभी बिषयों में राग - द्वेष होते हैं , उचित है
लेकीन मूलतः बिषयों में कोई रस नहीं होता ॥

===== ॐ =======

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