Wednesday, February 18, 2009

गीता-बूँदें

ऋषि एवं वैज्ञानिक
ऋषि की यात्रा सत्य परआधारित होती है और वैज्ञानिक की यात्रा संदेह पर आधारित है--जितना गहरा संदेह
होगा उतनी गहरी बात निकलेगी ऋषि का मन स्थिर तथा बुद्धि संदेह रहित होती है और वैज्ञानिक का मन
चंचल एवं बुद्धि भ्रमित रहती हैवैज्ञानिक जो कुछ भी बोलता है वह उसको सिद्ध करना चाहता है लेकिन ऋषि
पहले तो बोलता ही बहुत कम है उसे बुलवाया जाता है और जो बोलता है उसे सिद्ध करने की बात उसके अंदर
आती ही नहीं वैज्ञानिक अपनी बात को क्यों सिद्ध करता है?इसका दो कारणहैं ......पहला कारण उसका
अंहकार है और दूसरा कारण उसका भय है वैज्ञानिक की सीमा मन-बुद्धि तक है और ऋषि मन-बुद्धि से
परेचेतना-मध्यमसे अनंत से जुड़ जाता हैकुछ ऐसे भी वैज्ञानिक हैं जिन्होंनें ऋषि की तरह बुद्धि से परे की
उडान अनजानें में भरी हैआइंस्टाइन सन १९०५ में मास-उर्जा समीकरण दिया जबकि ऎटमकी संरचना
सन १९३२ में पुरी हो पाईयह बात सोचनें की हैगीता-मोटी आप को विज्ञानं के मध्यम से परम ज्ञान
की ओरइशारा करेगा अंततः यात्रा तो आप को ही करनी हैजब तक आप की मैत्री इन्द्रियों से नहीं होती
जबतक मन नियोजित नही होता और बुद्धि संशय रहित नही होती तबतक अहंकार श्रद्धा में नही बदल
सकता और तबतक सत्य की खुशबू नहीं मिल सकती

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