Wednesday, February 18, 2009

गीता-साधना

गीता-साधना
गीता के सम्बन्ध में अभींतक हम उन बातोंको लिया है जिनका सीधा सम्बन्ध साधना से है
गीता में ७०० श्लोकों को १८ अध्यायों में बिभक्तकिया गया है जिनमें पहला श्लोक धृत रास्ट्रजी का
है,५५६ श्लोक परम श्री कृष्ण के हैं,१०३ श्लोक अर्जुन के हैं और १०३ श्लोक संजय के हैं
गीता जैसा उपलब्ध है यदि आप वैसे ही पढेंगेतो आप को वह नहीं मिल पायेगा जो आप की खोज
है अतः आप को गीता पढनें की कला आनीं चाहिए
गीता पढ़नें की कला
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्ब्यतितरिष्यति
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतब्यस्य श्रुतस्यच .......श्लोक २.५२
इस श्लोक का भाव है ....मोह के साथ बैराग्य नहीं मिल सकता
इस सन्दर्भ में आप श्लोक ६.२७ को भी देखें जो कहता है..........
राजस गुंड के साथ परमात्मा से जुड़ना असंभव है
मोह तामस का तत्त्व है और राजस के तत्त्व हैं काम,कामना तथा भोग
गीता के ऊपर दिए गए दो सूत्र स्पष्ट रूप से कह रहे हैं .....राजस तथा तामस गुंडों के साथ परमात्मा
से जुड़ना असंभव हैगीता श्लोक ६.२७ अर्जुन के पांचवे प्रश्न के सन्दर्भ में बोला गया है इस प्रश्न में
अर्जुन पूछते हैं....आप कर्म योग तथा कर्म-संयाश दोनों की बातें कर रहे हैं लेकिन मेरे लिए कौन
सा उत्तम है?परम आगे श्लोक ५.६ में कहते हैं ......कर्म-योग कर्म-संयाश कम माद्यम है अतः दोनों
भ्रम नहीं होना चाहिए अब आप गीता सूत्र ३.४,३.२०,१८.४९,१८.५०,३.५,५.२२,६.३०,९.२९,१८.११,१८.३८,१८.४८,१८.५४,१८.५५ को देखिये तब आप को एक समीकरण मिलेगा जो कर्म तथा कर्म -योग एवं कर्म-संयाश को स्पष्ट करेगा
गीता यहाँ बताता है..........कर्म-त्याग से नैष्कर्म्य -सिद्धि नहीं मिल सकती ,यह आसक्ति रहित कर्म से
मिलती हैयह सिद्धि ज्ञान योग की पारानिष्ठा है,अब आप गीता समीकरण को पुरी तरह देखें
जिव धारी एक पल के लिए भी कर्म रहित नहीं होसकता , ऐसा कोई कर्म नहीं है जिसमे दोष न हों
गुणों से कर्म होते हैं और ऐसे कर्म भोग होते हैंभोग कर्म के सुख में दुःख कम बीज होता है
गीता में गीता -शब्दोंका गीता में भाव खोजना गीता की साधना है और अपना भाव रखना अंहकार को
सघन करता है अतः आप से प्रार्थना है की गीता शब्दों कम आप अर्थ गीता में ही खोजें
गीता सूत्र २.५२ बताया की मोह के साथ वैराग्य नहीं मिलता फ़िर हमें देखना पड़ेगा ,वैराग्य क्या है?
गीता सूत्र १५.३ कहता है....वैराग्य में संसार को जाना जाता हैसंसार को समझनें के लिए गीता सूत्र १५.२,१५.२,१५,३ को देखना चाहिए जो कहते हैं ......तीन गुणों के माया माध्यम में परमात्मा से परमात्मा में संसार हैसंसार अविनाशी है लेकिन इसकी स्थिति अच्छी तरह से नहीं है वैराग्य में
ज्ञान मिलता है ,ज्ञान वह है जिस से क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ के प्रति होश उपजता हैवैराग्य स्व का कृत्य नहीं यह तो प्रभू का प्रसाद है जो साधना के फलित होनें पर मिलता हैगीता को तोते की तरह याद करना तो बहुत आसान है लेकिन गीता में तैर कर गीता मोतियों को इकट्ठा करना अति कठिन काम है और उन मोतियों में बसना और भी कठिन है........क्या आप तैयार हैं?

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