Thursday, April 2, 2009

क्या आप जानते हैं?--३

मनुष्य के अंदर सूचना भेजने और सूचना प्राप्त करनें के सेंसर कुदरत लगा रखी है--हम सूचना भेजते रहते हैं और
दूसरे द्वारा भेजी गयी सूचना को ग्रहण भी करते हैं लेकिन इस बात पर यकींन कितनें करते हैं? मनुष्य में चेतना एक ऐसा तत्त्व है जो सूचनाओं के भेजने तथा उनको ग्रहण करनें का काम करती है लेकी चेतना क्या है? इस बात के प्रति कितनें लोग संवेदनशील हैं। मन,बुद्धि,चेतना तथा आत्मा का एक ऐसा माध्यमकुदरत से हमें मिला हुआ है जो क्या है के बारेमें सोचना हमें संदेह की ओरले जाता है। मन-बुद्धि को कुछ हद तक समझनें का प्रयत्न तो किया जा सकता है लेकिन चेतना-आत्मा को बुद्धि में कैद करना असंभव बात है। चेतना चेतन मय कणोंको हर पल छोड़तीहै जैसे एक राज-धर्मी पदार्थ करता है। बच्चा चाहे जितनी दूरक्यों न हो उसके अन्तः करणकी गहरी
संवेदनाएं अज्ञात माध्यम से उसकी माँ तक पहुंचती रहती हैं और माँ उनसे अप्रभावित नही रह पाती। चेतना की
उर्जा आत्मा से है,आत्मा स्वयं परमात्मा का अंश है ।
बच्चा अपनें माँ की गोदी में जन्नत का आनंद पता है लेकिन पिता की गोदी में उसको ऐसा अनुभव नही
मिल पाता। पिता दिन-रातभोग संसार में भागता फिरता है--उसको अपना परिवार चलाना है की सोच एक पल भी
कही रूकनें नहीं देती। पिता का सांसारिक सफर यदि बेहोशी भरा है तो वह पिटा विकारों से भरता चला जाता है।
धीरे-धीरे उसकी विकार रहित उर्जा विकारों से भर कर नकारात्मक उर्जा में बदल जाती है जिसकी भावों को खीचनें
की शक्ति रूपांतरित हो कर उसे परिवार से दूर करनें लगाती है। सनासर पिता को अपनें बच्चे से दूर करता है और माँ----माँ बच्चे कोगोदी में लेकर संसार की तरफ़ पीठ करके बैठ कर अपनें बच्चे में खोई रहती है जिसको गीता
परा-भक्ति कहता है। एक बच्चा माँ को विकार रहित करके निर्विकार बना कर परमात्मातुल्य बना देता है और
पीता जो मन-बुद्धि का गुलाम होकर अंहकार से भरा हुआ स्वयं को सब कुछ समझता हुआ संसार के गुरुत्व में
उलझ कर स्वयं के परिवार से दूर होता चला जाता है -----और एक दिन आ ही जाता है जब--------
वह अपनें ही घर में स्वयं को बेगाना सा देखनें लगता है।
संसार में बेहोशी भरा जीवन नर्क का जीवन है और होश भरा जीवन परमानन्द है---आप सीसा चाहें वैसा आप का
जीवन ह सकता है ............लेकिन इतना याद रखें ............
माँ की जगह कोई नही भर सकता
=========ॐ========

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