Saturday, April 4, 2009

दर्द का रिश्ता --१

दर्द परम धाम एवं नर्क ,दोनों का द्वार है।
दर्दमेंरुक जानानर्क की ओरलेजाता है और दर्द की मैत्री परम-धाम की यात्रा है।
मीरा में दर्द उठा मीरा उस दर्द को स्वीकारा और जीवन भर उसके साथ रहीऔर कहते हैं मीरा द्वारिका धीशकी मूर्ति में समा गयी थी। कहानियाँ अपनें में परम सत्य को छिपाए होती हैं,उन सत्यों को खोजना ही साधना है। कहानियो को मनोरंजन का साधन बनाना नर्क की ओर की यात्रा है और कहानियों में सत्य को खोजना ही परमात्मा की खोज है। कहानियो का एक छोर नर्क की ओर होता है और दूसरा छोर निर्वाण की ओर इशारा करता है।
मीरा[1498-1546] नानक[1469-1539] कबीर[1398-1518] भारत भूमि पर एक साथ 20 वर्ष तक रहे और वह वक्त था अकबर का। मीरा अपनें दर्द को मथुरा से द्वारिका तक फैलाया,उनका केन्द्र था कन्हैया।
कबीर अपंनीभूख की दर्द को राम से जोड़ कर काशी के अहंकारी तर्क-शास्त्रिओं में वेदान्त की लहर उठानी चाही।
नानक कहते हैं-----नानक दुखिया सब संसार और अपनें इस मूल-मंत्र के साथ पंजाब से कर्बला,मक्का और
जेरुसलेम तक की यात्रा करते रहे। नानक-कबीर का केन्द्र राम था और मीरा का केन्द्र कन्हैया था। आप के
दर्द का केन्द्र क्या है? मीरा कम उमर में अपनें सभी सम्बन्धियों को खो दियाथा जैसे माँ,पिता,पति, सशुर आदि।
वृन्दाबन में जब उनका रहना सम्भव न हो सका तब उनको द्वारिका में शरण लेनी पड़ी थी। मीरा के आखिरी वक्त
के समय उनके खानदान का एक सदस्य मेवार का राजा था जिस को मीरा से बहुत लगाव था। राजा अपनें सेना का एक दल द्वारका मीरा को लेने केलिए भेजा सेनापति के आग्रह के सामनें मीरा ना न कह पायी और बोली--
ठीक है मैं चलूंगी लेकिन पहले कन्हैया से पूछ लू---आप लोग यही विश्राम करें। कहानी कहती है की मीरा गयी
कन्हैया के सामनें और उस मूर्ती में समा गयी। आप क्या समझ रहे हैं ---क्या यह बात सही है?----सही होनी
ही चाहिए परम-भक्त मूर्ती में समाया ही होता है।
मीरा का दर्द परम-धाम दिया और आप अपनें दर्द से क्या उम्मीद करते हैं?



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